लाला बलवंत खत्री और इज्जत वाला कुआं


भारत विभाजन की सबसे हृदयविदारक सच्चाई — "लाजो ने कहा, तुस्सी काटो बापूजी, मैं मुसलमानी नहीं बनूंगी"


सन 1947 का वो भयावह वर्ष जब भारत को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन उसकी कीमत लाखों जिंदगियों, असंख्य बलात्कारों और करोड़ों आँसुओं से चुकाई गई। अंग्रेजों के “Divide and Rule” के अंतिम दांव ने भारत को दो टुकड़ों में बाँट दिया — भारत और पाकिस्तान। लेकिन यह विभाजन केवल ज़मीन का नहीं था, यह आत्माओं का, संस्कारों का, संस्कृति और नारी की अस्मिता का बंटवारा था। इतिहास में शायद ही कोई और ऐसा उदाहरण होगा, जब एक रात में इतने बड़े पैमाने पर नरसंहार, पलायन और बलात्कार हुए हों। अनुमान है कि करीब 10 लाख से अधिक हिंदू और सिखों की हत्या कर दी गई, और 2.5 लाख से ज़्यादा महिलाओं का अपहरण करके उन्हें जबरन मुसलमान बना दिया गया। लेकिन इसी विभाजन की कालिमा में एक ऐसा वाकया घटित हुआ, जो आज भी सुनने वाले के रोंगटे खड़े कर देता है। यह कहानी है — लाजो और उसके पिता लाला बलवंत खत्री की, जो गुज़ारांवाला जो अब पाकिस्तान में है, के रहने वाले थे। सरदार हरि सिंह नलवा की जमीन।

लाला बलवंत राय खत्री एक प्रतिष्ठित और समृद्ध ज़मींदार थे। मुसलमानों से अच्छे संबंध रखते थे, यहाँ तक कि उनकी सहायता भी करते थे। उनके परिवार में पत्नी प्रभावती, एक छोटा बेटा बलदेव (6 वर्ष) और सात बेटियाँ थीं — लाजो (19), रज्जो (17), भागो (16), पारो (15), गायो (13), इशो (11), और सबसे छोटी उर्मी (9)। उनकी पत्नी प्रभावती उस समय 7-8 महीने की गर्भवती थीं। परिवार सुखी था, लेकिन जैसे ही विभाजन की आग पंजाब और सिंध की धरती पर फैलनी शुरू हुई, इस सुख-शांति को नरसंहार ने निगल लिया। गुजरांवाला के आसपास के इलाकों से हिन्दू सिखों के कत्लेआम की खबरें आने लगी थी। ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का शोर करती भीड़ यलगार करती, काफिरों की औरतें भारत न जा पाएं, हम उन्हें हड़प लेंगे।

लेकिन लाला जी उर्फ बलवंत खत्री जी बेफिक्र थे। उन्हें गांधी के आदर्शों पर यकीन था। उन्हें लगता था ये कुछ मजहबी मदांध हैं। दो चार दिन में शांत हो जाएंगे। और गुजरांवाला तो जट, गुज्जरों और राजपूत मुसलमानों का शहर है। सब ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया’ गाने वाले लोग हैं। बाबा बुल्ले शाह और बाबा फरीद की कविताएं पढ़ते हैं, सूफी मजारों पर जाते हैं । लाला जी का मन कहता था, सब भाई हैं, एक दूसरे का खून नहीं बहाएंगे।

18 सितंबर 1947, एक सिक्ख डाकिया हांफते हुए हवेली पहुँचा, चिल्लाया, लाला जी इस जगह को छोड़ दो। तुम्हारी बेटियों को उठाने के लिए वे लोग आ रहे हैं। लाजो को सलीम ले जाएगा। रज्जो को शेख मुहम्मद। भागो… लाला बलवंत ने उस डाकिए को जोरदार तमाचा जड़ते हुए कहा, क्या बकवास कर रहे हो। सलीम, मुख्तार भाई का बेटा है। मुख्तार भाई हमारे परिवार की तरह हैं।

उसका जवाब था, “मुख्तार भाई ही भीड़ लेकर निकले हैं, लाला जी। सारे हिन्दू-सिख भारत भाग रहे हैं। 300-400 लोगों का एक जत्था घंटे भर में निकलने वाला है। परिवार के साथ शहर के गुरुद्वारे पहुंचिए।” यह कह वह सिक्ख डाकिया सरपट भागा। शायद उसे दूसरे घर तक भी खबर पहुंचानी होगी। लाला जी पीछे मुड़े तो सात महीने की गर्भवती प्रभावती की आंखों से आंसू निकल रहे थे। उसने सारी बात सुन ली थी।

उसने सारी बात सुन ली थी। उसने कहा, लाला जी हमें निकल जाना चाहिए। मैंने बच्चों से गहने, पैसे, कागज बांध लेने को कहा है। पर लाला जी का मन नहीं मान रहा था। कहा, हम कहीं नहीं जाएंगे। सरदार झूठ बोल रहा है। मुख्तार भाई ऐसा नहीं कर सकते। मैं खुद उनसे बात करूंगा। प्रभावती ने बताया, वे पिछले महीने घर आए थे। कहा कि सलीम को लाजो पसंद है। वे चाहते हैं कि दोनों का निकाह हो जाए। लज्जो ने भी बताया था कि सलीम अपने दोस्तों के साथ उसे छेड़ता है। इसी वजह से उसने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया। लाला बलवंत बोले, तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई। मैं मुख्तार भाई से बात करता। प्रभावती बोलीं, आप भी बहुत भोले हैं। मुख्तार भाई खुद लाजो का निकाह सलीम से करवाना चाहते हैं। अब उसे जबरन ले जाने के लिए आ रहे हैं।

विचलित होकर लाला बलवंत राय अपने परिवार को लेकर नज़दीकी गुरुद्वारे में शरण लेने चले गए, जहाँ पहले से ही दर्जनों हिंदू-सिक्ख परिवारों ने अपने परिवारों के साथ डेरा जमा लिया था। वह गुरुद्वारा अब एक आख़िरी उम्मीद का किला बन चुका था।

गुजरांवाला पहलवानों के लिए मशहूर था। कई मंदिरों और गुरुद्वारों के अपने अखाड़े थे। हट्टे कट्टे हिन्दू सिक्ख गुरुद्वारे के द्वार पर सुरक्षा में मुस्तैद थे। कुछ लोग छत से निगरानी कर रहे थे। कुछ लोग कुएं के पास रखे पत्थरों पर तलवारों को धार दे रहे थे। 

अचानक एक भीड़ की आवाज आनी शुरू हुई। यह भीड़ बड़ी मस्जिद की तरफ से आ रही थी। वे नारा लगा रहे थे,

– पाकिस्तान का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह

– हंस के लित्ता पाकिस्तान, खून नाल लेवेंगे हिंदुस्तान

– कारों, काटना असी दिखावेंगे

– किसी मंदिर विच घंटी नहीं बजेगी हून

– हिंदू दी जनानी बिस्तर विच, ते आदमी श्मशान विच


भीड़ में शामिल लोगों के हाथों में तलवार, फरसा, चाकू, चेन और अन्य हथियार थे। गुरुद्वारा उनका निशाना था।

गुरुद्वारे के अंदर सिर्फ 400 के क़रीब हिंदू-सिख मौजूद थे, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुज़ुर्ग अधिक थे।

अचानक पुजारी और पहलवान सुखदेव शर्मा की आवाज गूंजी। वे बोले, “वे हमारी मां, बहन, पत्नी और बेटियों को लेने आ रहे हैं। उनकी तलवारें हमारी गर्दन काटने के लिए है। वे हमसे समर्पण करने और धर्म बदलने को कहेंगे। मैंने फैसला कर लिया है, झुकुंगा नहीं। अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा, न ही उन्हें अपनी स्त्रियों को छूने दूंगा।” चंद सेकेंड के सन्नाटे के बाद ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल, वाहे गुरु जी दा खालसा, वाहे गुरु जी दी फतह’ से गुरुद्वारा गूंज उठा। वहां मौजूद हर किसी ने हुंकार भरी, हममें से कोई अपने पुरखों का धर्म नहीं छोड़ेगा।

50-60 लोगों ने गुरुद्वारे में घुसने की कोशिश की। देखते ही देखते ही उनका सिर धड़ से अलग हो गया। जबकि गुरुद्वारे में मौजूद लोगों को कोई नुकसान नहीं हुआ था। महिलाएं और बच्चे भी अंदर हॉल में सुरक्षित थे। यह देख वह मजहबी भीड़ गुरुद्वारे से थोड़ा पीछे हट गई। करीब 30 मिनट तक गुरुद्वारे से 50 मीटर दूर वे खड़े होकर मजहबी नारे लगाते रहे। ऐसा लग रहा था मानो उन्हें किसी चीज का इंतजार है। जिसका इंतजार था, वे आ गए थे। हजारों मौजहबियों का हुजूम, बाहर हजारों लोग। गुरुद्वारे के अंदर मुश्किल से 400 हिंदू-सिख, उनमें 50-60 युवा, बाकी बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे।

अंतिम लड़ाई का क्षण आ चुका था। भीड़ ने एक सिक्ख महिला को आगे खींचा। वह नग्न और अचेत थी। भीड़ में शामिल कुछ लोग उसे नोंच रहे थे। अचानक किसी ने उसका वक्ष तलवार से काट डाला और उसे गुरुद्वारे के भीतर फेंक दिया।

गुरुद्वारे में मौजूद गुजरांवाला के हिन्दू सिखों ने इससे पहले इस तरह की बर्बरता के बारे में सुना ही था। पहली बार आंखों से देखा। कुछ परिवारों ने पहले से ज़हर रख रखा था, ताकि उनकी बेटियों को जिंदा दरिंदों के हवाले न करना पड़े। परंतु अधिकांश के पास न ज़हर था, न कोई चारा। अब केवल दो ही विकल्प थे — या तो बेटी की अस्मिता जाते देखें, या खुद अपने हाथों से उन्हें मृत्यु दे दें।

भीड़ ने दरवाजे पर चढ़ाई की, कत्लेआम मच गया। हिन्दू सिख लड़े बांकुरों की तरह। पर गिनती के लोग, हजारों के हुजूम के सामने कितनी देर टिकते।

यहीं लाला बलवंत खत्री जी का मनोबल टूट गया। उनकी बड़ी बेटी लाजो, जिसे सलीम जैसे वहशी के हवाले किया जाना था, उनके पास आई। उसने कहा – "बापूजी, आप मुझे काट दीजिए। मैं मुसलमानी नहीं बनूंगी। आप ही मेरी रक्षा कर सकते हैं, लेकिन ज़िंदा रखेंगे तो मेरी इज्जत नहीं बचेगी।" पिता का कलेजा कांप गया। वे फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने इनकार किया, लेकिन लाजो ने उनका हाथ पकड़कर तलवार उठाई और कहा — “तुस्सी काटो बापूजी… मैं मुसलमानी नहीं बनूंगी। जल्दी करो। अगर आपने नहीं मारा तो वे मेरे वक्ष…” फिर क्या था, दर्द से टूटे पिता ने अपनी बेटी का वक्तव्य पूरा होने से पहले ही उसका गला काट दिया। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य है।

उसके बाद एक-एक करके रज्जो, भागो, पारो, गायो, इशो और उर्मी — सभी बहनों ने स्वयं आगे बढ़कर अपने पिता से मौत की भीख मांगी। वे रोते नहीं थीं, वे डरती नहीं थीं — वे केवल कहती थीं: "बापूजी, हमारी अस्मिता आपके हाथों में सुरक्षित है।" हर बेटी का माथा चूमा… और फिर तलवार का वार। एक-एक करके सभी बेटियाँ अपनी बलि दे गईं

हर बार केवल एक ही बात – धर्म की रक्षा हो… बेटियों की इज्ज़त बचे…

माँ प्रभावती उन सातों की लाशों को देखती रहीं — उसकी कोख में आठवां बच्चा था, पर उसकी आत्मा पहले ही मर चुकी थी। बाहर की भीड़ ने शवों को भी नोंचने की कोशिश की थी।

लाला बलवंत ने बेटियों की लाशें गुरुद्वारे के पीछे कुएं में डाल दीं, ताकि वो नरपिशाच उन्हें भी अपवित्र न कर सकें।

लाला जी ने प्रभावती से कहा: “तांगा बाहर खड़ा है। बेटे बलदेव के साथ जाओ। अजन्मे बच्चे के लिए जीवित रहना ज़रूरी है।”


प्रभावती बोलीं: “बिना आपके कैसे जाऊं?”

लाला जी ने कहा: “दो बच्चों के पास मां है… सात के पास पिता होना चाहिए।”

इसके बाद लाला बलवंत खत्री ने कहा — "अब जीने का कोई अर्थ नहीं है।"

वह खुद को चाकुओं से गोदते हुए उसी कुएं में कूद पड़े, जिसमें उनकी बेटियों की लाशें पड़ी थीं।

“अगर बेटियों को मरते देखा और खुद जीवित रहा,

तो यह धर्म नहीं, धिक्कार होगा।”

– ये उनके अंतिम शब्द माने जाते हैं।


बेटा बलदेव और पत्नी प्रभावती, जो 8 महीने की गर्भवती थीं, उन्हें अमृतसर भेजा गया। सिक्ख स्वयंसेवकों ने उन्हें खेतों के रास्ते बॉर्डर पार करवाया।

कई किलोमीटर तक पैदल चलकर वे भारत पहुंचे। प्रभावती ने भारत में आने के बाद एक बेटी को जन्म दिया, जिसे उन्होंने "जीवती" नाम दिया — जो प्रतीक थी कि बाकी सब मृत हो चुके थे।

यह घटना किसी काल्पनिक कहानी का हिस्सा नहीं है। भारत सरकार की 1950 की शरणार्थी रिपोर्ट में यह दर्ज है। स्वतंत्रता सेनानी स्वामी श्रद्धानंद के अनुयायी लालाजी को गुरुद्वारे में अंतिम बार देखा गया था। गुज़रांवाला का वही गुरुद्वारा आज भी पाकिस्तान में मौजूद है और उसके पीछे का कुआं "इज्जत वाला कुआं" कहलाता है। यह घटना उन लाखों कहानियों में से सिर्फ एक है, जो विभाजन के समय घटीं — लेकिन यह हमें याद दिलाती है कि धर्मांतरण केवल तलवार से नहीं, भय से भी होता है… और सम्मान बचाने के लिए कई बार मृत्यु को गले लगाना पड़ता है।

पाकिस्तान में सन् 1947 में हिन्दू सिखों का कत्लेआम हुआ। स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। उन्हें नग्न कर घुमाया गया। उनके वक्ष काट डाले गए।

आज जब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उन दरिंदों को हीरो बनाने की कोशिश की जाती है, तो यह सच्ची कहानी धिक्कार बनकर सामने आती है। यह बताती है कि स्वतंत्रता केवल झंडा फहराने से नहीं मिलती — इसके पीछे कितने लाजो, कितनी प्रभावती और कितने लाला बलवंत बलिदान हुए हैं, यह जानना भी उतना ही आवश्यक है।


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