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भारत के जेन जी की करतूत

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  ओटीटी के पर्दे से गटर की तरह बही भाषा का कचरा आख़िरकार जंतर-मंतर के रास्तों से होकर देश के दीवानखानों तक पहुँच ही गया। सोशल मीडिया पर तैरती उन तस्वीरों और वीडियो ने नई पीढ़ी की तथाकथित 'क्रांतिकारी' युवतियों के चरित्र, संयम और संस्कारों की जो धज्जियाँ उड़ाई हैं, उसने पूरे समाज के माथे पर कलंक का टिका लगा दिया है। जब सड़कों पर खड़े होकर जुबान से आज़ादी के नाम पर नंगनाच किया जाएगा, तो कल को यही विकृति घरों के भीतर पहाड़ों से धकेलने, संदूकों में लाशें सड़ाने और नीले ड्रमों में रिश्तों को बंद करके नदियों में बहाने का दुस्साहस बनेगी। शबाना आजमी, अरुंधती रॉय और स्वरा भास्कर जैसे ठेकेदारों को आज अपनी इस 'प्रोग्रेसिव फसल' को लहलहाते देखकर यकीनन गहरा सुकून मिल रहा होगा, जिनका पूरा जीवन ही इस देश की पारिवारिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने और कुंवारे-अनब्याहे वंश की पौध तैयार करने में बीत गया। जिस भारत की पहचान वीरांगनाओं के त्याग, शौर्य और गरिमा से थी, वहाँ ये बदजुबान, उच्छृंखल और जुबानी जुगली करने वाली जमात कहाँ से पैदा हो गई? अगर सड़कों पर गंदी-गंदी गालियों का भौंडा प्रदर्शन ही नारी सश...

चीन के हेबेई प्रांत के औद्योगिक शहर तांगशान में एक विनाशकारी भूकंप

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  28 जुलाई 1976 को सुबह 3:42 बजे चीन के हेबेई प्रांत के औद्योगिक शहर तांगशान में एक विनाशकारी भूकंप आया था। रिक्टर पैमाने पर 7.8 की तीव्रता वाले इस भीषण भूकंप ने पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया था। इस प्राकृतिक आपदा में शहर की 85 प्रतिशत से अधिक इमारतें पूरी तरह ढह गईं। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस तबाही में लगभग 2,42,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और करीब 1,60,000 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह आधुनिक इतिहास के सबसे घातक भूकंपों में से एक माना जाता है। #चीन #भूकंप #earthquake #China #chinese #Fact #History #factsdaily

भारत में पहली बार उँगलियों के निशान का उपयोग किया

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  28 जुलाई 1858 को भारतीय सिविल सेवा के ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम जेम्स हर्शेल ने भारत में पहली बार उँगलियों के निशान का उपयोग किया था। बंगाल के जंगीपुर में तैनात हर्शेल ने एक स्थानीय व्यापारी राजधर कोनाई के साथ सड़क निर्माण सामग्री की आपूर्ति का एक आधिकारिक अनुबंध किया था। इस समझौते पर हस्ताक्षर को धोखाधड़ी से बचाने और भविष्य में मुकरने से रोकने के लिए उन्होंने व्यापारी के दाहिने हाथ की हथेली और उँगलियों की छाप कागज़ पर ली थी। यह कदम प्रशासनिक और कानूनी कार्यों में पहचान सुनिश्चित करने के लिए फिंगरप्रिंट तकनीक के इस्तेमाल की शुरुआत बना, जो बाद में चलकर आधुनिक फोरेंसिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा साबित हुआ। #भारत #इतिहास #Bharat #History #Fact #factsdaily #facts #IndianHistory #Fingerprint

पहला विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914

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  प्रथम विश्व युद्ध मानव इतिहास का एक अत्यंत विनाशकारी और युगांतरकारी वैश्विक संघर्ष था, जिसकी शुरुआत आधिकारिक तौर पर 28 जुलाई 1914 को हुई थी। इस महायुद्ध का तात्कालिक कारण 28 जून 1914 को बोस्निया की राजधानी साराजेवो में ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की एक सर्बियाई राष्ट्रवादी द्वारा की गई हत्या थी। इस घटना से आक्रोशित होकर ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया को एक कठोर अल्टीमेटम दिया और उसकी मांगें पूरी न होने पर ठीक एक महीने बाद सर्बिया के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया। इस घोषणा ने यूरोप में बारूद के ढेर की तरह काम किया और देखते ही देखते पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। युद्ध की शुरुआत होते ही यूरोप में पहले से बनी गुप्त संधियों के जाल ने एक श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू कर दी। सर्बिया की रक्षा के लिए रूस आगे आया, जिसके जवाब में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी का साथ देते हुए रूस और फ्रांस के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। जब जर्मन सेना ने बेल्जियम के रास्ते फ्रांस पर हमला किया, तो बेल्जियम की तटस्थता की रक्षा के लिए ब्रिटेन भी इस जंग में कूद ...

Reservation Hatao Andolan (RHA)

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  राष्ट्र की उन्नति का सीधा और अटूट नियम केवल एक है प्रतिभा की कद्र और मेहनत का सम्मान। लेकिन जब कोई देश योग्यता के बजाय पर्ची, काबिलियत के बजाय जन्म और बुद्धिमत्ता के बजाय जाति के प्रमाण पत्र पर अपनी व्यवस्था की नींव रखने लगे, तो विकास का पहिया आगे बढ़ने के बजाय गड्ढे में धंसने लगता है। किसी भी महाशक्ति बनने की होड़ में शामिल राष्ट्र के लिए यह पहली शर्त होनी चाहिए कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं, प्रशासनिक पदों और नीति-निर्माण की बागडोर देश के सबसे उत्कृष्ट दिमागों के हाथों में हो। अफसोस और विडंबना यह है कि जहां पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान और वैश्विक शोध में नए झंडे गाड़ रही है, वहां हमारे यहां मेधा का मापदंड प्रतिभा से नहीं, बल्कि जातिगत समीकरणों से तय हो रहा है। देश की नींव मजबूत रहेगी तो समाज और उसकी पहचान भी बची रहेगी, लेकिन यदि वोटबैंक और तुष्टीकरण के फेर में राष्ट्र का ढांचा ही खोखला हो गया, तो किसी भी जाति का वजूद नहीं बचने वाला। मेहनत, लगन और काबिलियत को हाशिए पर धकेल कर कोई भी देश दुनिया का नेतृत्व करने का ख्वाब नहीं देख सकता। जब एक मेधावी युवा अपनी...

कारगिल विजय दिवस भारत में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को मनाया जाता है

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  कारगिल विजय दिवस भारत में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को मनाया जाता है, जो सन 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की ऐतिहासिक जीत और वीर जवानों के सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है। वर्ष 2026 में देश इस शौर्य गाथा की 27वीं वर्षगांठ मना रहा है। #कारगिल #कारगिल_विजय_दिवस #KargilVijayDiwas #Bharat #Hindu #भारत #हिन्दू #IndianArmy

Kargil Vijay Diwas कारगिल विजय दिवस

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  कारगिल युद्ध 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर के कारगिल जिले में लड़ा गया एक भीषण सशस्त्र संघर्ष था। इस युद्ध की शुरुआत मई 1999 में हुई, जब पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करके कारगिल, द्रास, बटालिक और तुर्तुक सेक्टर की रणनीतिक चोटियों पर गुप्त रूप से कब्जा कर लिया था। पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य श्रीनगर और लेह को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 1डी को काटना था, ताकि सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख का संपर्क बाकी भारत से पूरी तरह टूट जाए। मई के शुरुआती हफ्ते में जब स्थानीय चरवाहों ने इन घुसपैठियों को देखा, तब भारतीय सेना को इस बड़े पैमाने की घुसपैठ का पता चला। इसके तुरंत बाद भारतीय सेना ने दुश्मन को खदेड़ने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसे आधिकारिक तौर पर 'ऑपरेशन विजय' नाम दिया गया था। यह युद्ध सैन्य इतिहास के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण युद्धों में से एक माना जाता है, क्योंकि यह 16,000 से 18,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर लड़ा गया था। भारतीय सैनिकों को न केवल दुश्मन का सामना करना था, बल्कि माइनस 15 डिग्री तक गिरने वाले तापमान, ऑक्सीजन की भारी ...