Posts

Featured

डायरेक्ट एक्शन डे 16 अगस्त 1947 Direct Action Day

Image
 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा घोषित डायरेक्ट एक्शन डे भारतीय इतिहास का एक अत्यंत काला अध्याय है, जिसका सबसे दर्दनाक और भयावह खामियाजा कोलकाता के बहुसंख्यक हिंदू समाज को भुगतना पड़ा। डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान हिंदुओं को जिस अमानवीय और दर्दनाक स्थिति का सामना करना पड़ा, उसकी पूरी विस्तृत और क्रूर सच्चाई इस प्रकार है। 16 अगस्त 1946 की सुबह कोलकाता के हिंदुओं के लिए एक ऐसा खौफनाक मंजर लेकर आई जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने सुबह से ही जबरन दुकानें बंद करवाना शुरू कर दिया और विरोध करने वाले हिंदू दुकानदारों पर लाठियों, छुरों और पेट्रोल बमों से हमले शुरू कर दिए। उस समय बंगाल के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने न केवल पुलिस को थानों में बंद रहने का गुप्त आदेश दिया, बल्कि लालबाजार पुलिस मुख्यालय के कंट्रोल रूम में खुद बैठकर स्थिति को नियंत्रित करने के बजाय दंगाइयों को संरक्षण दिया। दोपहर में जब शहीद मीनार मैदान पर लाखों की हिंसक भीड़ जमा हुई, तो सुहरावर्दी ने मंच से खुलेआम कहा कि पुलिस और सेना उनके काम में दखल नहीं देगी। इस उकसावे के बाद हथियारों...

लोकतांत्रिक पदों पर लगातार 25 वर्ष रहने और इस दौरान हर साल 15 अगस्त को ध्वजारोहण करने करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी

Image
 लोकतांत्रिक पदों पर लगातार 25 वर्ष रहने और इस दौरान हर साल 15 अगस्त को ध्वजारोहण करने का एक ऐसा अनोखा रिकॉर्ड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनाया है जो देश का कोई और प्रधानमंत्री नहीं बना सका। आज 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से लगातार 13वीं बार तिरंगा फहराकर उन्होंने इतिहास रचा है। इस गौरवशाली पल के पीछे उनका एक अनूठा लोकतांत्रिक सफर छिपा है क्योंकि वे देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो लगातार 25 वर्षों से शीर्ष लोकतांत्रिक पदों पर बने हुए हैं। इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत अक्टूबर 2001 में हुई जब उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला। मई 2014 तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने लगातार 12 बार राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोहों में तिरंगा फहराया। इसके बाद मई 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने से लेकर आज तक उन्होंने लगातार 13वीं बार देश के मुख्य मंच से ध्वजारोहण कर राष्ट्र को संबोधित किया है।यह रिकॉर्ड इसलिए सबसे अलग है क्योंकि भारत के इतिहास में जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या मनमोहन सिंह जैसे नेता कभी मुख्यमंत्री नहीं रहे और सीधे प्रधानमंत्री बने। जबकि प्रथम बार जवाहर लाल ने...

15 अगस्त 1947 को इंडिया गेट पर तिरंगा फहराया मनोनीत प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा

Image
  15 अगस्त 1947 को नई दिल्ली में इंडिया गेट के पास स्थित प्रिंसेस पार्क में पहली बार आधिकारिक सार्वजनिक समारोह में तिरंगा झंडा फहराया गया था और इस ऐतिहासिक ध्वजारोहण को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ही संपन्न किया था। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि लाल किले की प्राचीर पर पहली बार तिरंगा इसके अगले दिन यानी 16 अगस्त 1947 को फहराया गया था। जवाहरलाल नेहरू को मनोनीत प्रधानमंत्री इसलिए कहा जाता है क्योंकि देश की आजादी के समय तुरंत आम चुनाव कराना संभव नहीं था। वर्ष 1946 में भारत की अंतरिम सरकार के गठन और कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान लोकतांत्रिक बहुमत पूरी तरह से सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में था। उस समय कुल 15 प्रांतीय कांग्रेस समितियों में से 12 समितियों ने सर्वसम्मति से सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव अध्यक्ष पद के लिए भेजा था, जबकि शेष 3 समितियों ने किसी भी नाम का प्रस्ताव नहीं किया था। ब्रिटिश सरकार की योजना के अनुसार जो व्यक्ति कांग्रेस का अध्यक्ष बनता, उसे ही अंतरिम सरकार का मुखिया और आगे चलकर देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया जाना तय था। इसके बावजूद, देश की एक भी प्रांतीय समिति ने ...

मानसून सत्र का हंगामे की भेंट चढ़ना

Image
 मानसून सत्र का हंगामे की भेंट चढ़ना और लोकसभा की उत्पादकता का गिरकर महज 15 प्रतिशत पर आ जाना भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे निराशाजनक अध्यायों में से एक है। पिछले 22 वर्षों में यह अब तक का सबसे निचला स्तर है, जो सीधे तौर पर इस बात को उजागर करता है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत को किस तरह राजनीतिक खींचतान का अखाड़ा बना दिया गया। संसद के संचालन पर प्रतिदिन लगभग 9 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जो सीधे तौर पर जनता के पसीने की कमाई और टैक्स का पैसा है। सत्र के दौरान लगातार वेल में आकर नारेबाजी करना, तख्तियां दिखाना और कार्यवाही को बार-बार स्थगित कराने की रणनीति ने इस भारी-भरकम बजट और अनमोल विधायी समय को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। इस पूरे गतिरोध में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और उसके शीर्ष नेता राहुल गांधी, साथ ही समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव जैसे विपक्षी चेहरों की भूमिका पर सीधे तौर पर सवाल उठते हैं। जनता ने इन नेताओं और सांसदों को चुनकर इसलिए भेजा था ताकि वे देश की बुनियादी समस्याओं, विकास योजनाओं और जनकल्याणकारी नीतियों पर नियम और कानून बनाने में अपनी भागीदारी निभाएं। लेकिन नीतिगत बहस...

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा Vs कामकोटि

Image
 संसद के पवित्र सदन में जब ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए थी, तब जनसेवा के नाम पर राजनीति का ककहरा सीख रही कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपनी अद्भुत और असीमित बौद्धिक क्षमता का परिचय दे डाला। एंटी-पेपर लीक बिल जैसे गंभीर मुद्दे पर ठोस बात करने के बजाय उन्होंने आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि पर तंज कसते हुए उन्हें 'गोमूत्र-एक्सपर्ट' की उपाधि दे डाली। यह वही तथाकथित 'गोमूत्र विशेषज्ञ' हैं जो कंप्यूटर आर्किटेक्चर, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी और देश के पहले स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर 'शक्ति' के जनक हैं, लेकिन शायद चुनावी रैलियों में ताली बटोरने वाली राजनीति के लिए विज्ञान की यह भाषा बेहद जटिल थी। प्रियंका गांधी ने बड़े गर्व से सवाल उछाला था कि आखिर इस 'एक्सपर्ट' को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा, मानो देश की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान को चलाने वाले वैज्ञानिक से ज्यादा शिक्षा की समझ सिर्फ परिवारवाद की छत्रछाया में पलने वाले नेताओं को ही होती है। जिस प्रोफेसर कामकोटि के एक पुराने वीडियो में 'नेचर' जैसे विश्व प्रसिद्ध जर्नल के वैज्ञानिक त...

पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए

Image
 पाकिस्तान के हुक्मरानों की बयानबाजी भी किसी अजब-गजब नाटक से कम नहीं लगती। जिस मुल्क की पूरी राजनीति और अस्तित्व ही भारत-विरोध की जमीन पर टिका हो, उसके वजीर-ए-आजम अपनी खोखली धमकियों को वजनदार बनाने के लिए भारतीय संस्कृति के महाकाव्य रामायण से उधार ली गई लक्ष्मण रेखा का मुहावरा इस्तेमाल कर रहे हैं। पानी की हर एक बूंद को अपनी संप्रभुता बताने वाले यह भूल जाते हैं कि जिस पानी पर वे अपनी जागीर का दावा ठोक रहे हैं, वह दशकों से सिंधु जल समझौते के तहत भारत के संयम और सद्भाव की बदौलत ही उनकी तरफ बह रहा है। अपनी जनता को बुनियादी जरूरतें देने में नाकाम हुकूमत जब भारत को अक्ल सिखाने और सीधा जवाब देने की गर्जना करती है, तो दुनिया डरने के बजाय केवल ठहाके लगाती है। हकीकत तो यह है कि पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए। कराची की सड़कों पर बूंद-बूंद के लिए टैंकर माफिया आम अवाम को लूट रहा है, सिंध और पंजाब प्रांतों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर आए दिन तलवारें खिंच जाती हैं, और बलूचिस्तान के लोग एक घूंट साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। दशकों से जो मुल्क अ...

1983 के गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो से गले मिलते हुए

Image
 कूटनीति और सार्वजनिक विमर्श के दोहरे मापदंडों पर यदि कभी खुली चर्चा हो, तो वर्तमान राजनीति के कुछ चेहरे पूरी तरह बेनकाब नजर आते हैं। जब इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए, तो 1983 के गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो के बीच हुए उस बहुचर्चित गले मिलने को कांग्रेस दशकों तक अपनी कूटनीतिक जीत और वैश्विक प्रभाव के रूप में प्रस्तुत करती रही है। उस समय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों और आत्मीयता को विदेश नीति की परिपक्वता बताया गया था। लेकिन आज जब वही राजनीतिक विरासत संभालने वाले नेता राहुल गांधी मंचों से अंतरराष्ट्रीय स्तर की महिला नेताओं और राजनयिक शिष्टाचार पर स्तरहीन टिप्पणियां करते हैं, तो उनकी समझ और कथनी-करनी का खोखलापन साफ दिखाई देने लगता है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर सार्वजनिक मंचों से जिस तरह की हल्की, फूहड़ और अशोभनीय बयानबाजी की गई, उसने राजनीतिक विमर्श के स्तर को बेहद नीचे गिरा दिया है। सवाल यह उठता है कि यदि ठीक उसी तरह की द्विअर्थी और भद्दी टिप्पणियां कभी हवाना में इं...