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द्वितीय विश्व युद्ध में जापान का आत्मसमर्पण

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  द्वितीय विश्व युद्ध का अंतिम चरण वैश्विक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील समय था। अगस्त 1945 की शुरुआत में जापान पर परमाणु बम हमलों और सोवियत संघ द्वारा युद्ध की घोषणा के बाद जापानी नेतृत्व गहरे संकट में था। इसी पृष्ठभूमि में 10 अगस्त 1945 को जापान की सरकार ने स्विट्जरलैंड के माध्यम से मित्र राष्ट्रों के समक्ष पॉट्सडैम घोषणा की शर्तों के आधार पर आत्मसमर्पण करने की अपनी प्रारंभिक इच्छा व्यक्त की। हालांकि इस प्रस्ताव में जापानी सम्राट हिरोहितो की संप्रभु स्थिति को बनाए रखने की शर्त शामिल थी, जिस पर मित्र राष्ट्रों के साथ कूटनीतिक बातचीत हुई। इसके बाद 15 अगस्त 1945 को सम्राट हिरोहितो ने पहली बार रेडियो पर रिकॉर्डेड संदेश के माध्यम से अपनी प्रजा को संबोधित किया, जिसे 'ज्वेल वॉयस ब्रॉडकास्ट' कहा जाता है। इस प्रसारण में उन्होंने आधिकारिक तौर पर जापान द्वारा मित्र राष्ट्रों की शर्तों को स्वीकार करने और युद्ध समाप्त करने की घोषणा की। इस घोषणा ने दुनिया भर में युद्ध के मैदानों पर सक्रिय संघर्ष को तो रोक दिया, लेकिन औपचारिक और कानूनी प्रक्रिया का पूरा होना अभी बाकी था। औपचार...

उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया का जन्म

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  द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में जापानी साम्राज्य के पतन के साथ ही कोरिया के आधुनिक विभाजन की कहानी शुरू हुई। वर्ष 1910 से ही कोरियाई प्रायद्वीप पर जापानी सेना का क्रूर औपनिवेशिक शासन था। जब वर्ष 1945 में मित्र देशों की जीत तय हो गई, तो जापानी सेना को आत्मसमर्पण कराने और कोरिया को स्वतंत्र कराने की योजना बनाई गई। इसी दौरान अगस्त 1945 में सोवियत संघ ने जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और उसकी लाल सेना ने तेजी से कोरिया के उत्तरी हिस्से में प्रवेश करना शुरू कर दिया। सोवियत सेना की इस त्वरित प्रगति को देखकर अमेरिका चिंतित हो गया क्योंकि वह पूरे कोरियाई प्रायद्वीप पर साम्यवाद का नियंत्रण नहीं चाहता था। अमेरिकी अधिकारियों ने आनन-फानन में एक आपातकालीन योजना तैयार की और सोवियत संघ के सामने कोरिया को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए उन्होंने नेशनल ज्योग्राफिक के एक नक्शे का उपयोग करके प्रायद्वीप के ठीक बीच से गुजरने वाली 38वीं समानांतर अक्षांश रेखा को विभाजन का आधार चुना। अमेरिका ने प्रस्ताव दिया कि इस रेखा के उत्तर में जापानी सेना सोवियत संघ के सामने आत्मसमर्पण क...

श्यामलाल गुप्त “पार्षद”

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  श्यामलाल गुप्त “पार्षद” का जन्म 16 सितंबर 1893 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के नर्वल कस्बे में एक वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर प्रसाद और माता का नाम कौशल्या देवी था। बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत पार्षद जी ने अपने पारिवारिक व्यवसाय को अपनाने से मना कर दिया और अध्यापन को अपना पेशा चुना। उन्होंने कानपुर के विभिन्न विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। इसके साथ ही वे देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से कूद पड़े। उन्होंने 'सचिव' नामक एक मासिक पत्र का संपादन और प्रकाशन किया, जिसके माध्यम से वे लोगों में आजादी की अलख जगाते थे। उन्होंने वर्ष 1924 में अपने सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा’ की रचना की थी। इस प्रेरक गीत ने स्वतंत्रता सेनानियों में अभूतपूर्व जोश भरने का काम किया। उनकी इस महान कृति की महत्ता को देखते हुए वर्ष 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में इसे देश के आधिकारिक 'झंडा गीत' के रूप में स्वीकार किया गया था। पार्षद जी जीवनभर सादगी और राष्ट्रस...

भारत में मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज के निजीकरण की शुरुआत कांग्रेस ने की थी

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  आज राहुल गांधी ने इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेज के निजी होने पर सवाल उठा रहा है और मोदी सरकार को कोस रहा है। सोचिए यह कितना बड़ा दोगलापन है। भारत में मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज के निजीकरण की शुरुआत कांग्रेस ने की थी राजनीतिक बयानबाज़ी के मंच से जब राहुल गांधी निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के नाम पर मोदी सरकार को घेरने निकलते हैं, तो यह सीधा-सीधा दोहरे रवैये का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आता है। जिस निजीकरण और डोनेशन कल्चर को आज वह देश के लिए अभिशाप बता रहे हैं, उसकी असली नींव किसी और ने नहीं बल्कि खुद कांग्रेस पार्टी ने ही अपने शासनकाल में रखी थी। इतिहास के पन्ने इस बात के पक्के गवाह हैं कि भारत में व्यावसायिक शिक्षा का बाज़ारीकरण कांग्रेस के दौर में ही फला-फूला। उडुपी में मणिपाल से लेकर कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र तक निजी कॉलेजों की जो फसल उगाई गई, उसके पीछे कांग्रेस नेताओं का ही सीधा संरक्षण और दबदबा था। 1980 के दशक में भारत में निजी इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों (Capitation fee colleges) की शुरुआत सबसे पहले कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से हुई। उस समय...

अमेरिका ने जापान के नागासाकी शहर पर "फैट मैन" नामक परमाणु बम्ब गिराया

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  9 अगस्त 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के नागासाकी शहर पर "फैट मैन" कोडनेम वाला एक अत्यंत विनाशकारी प्लूटोनियम परमाणु बम गिराया। अमेरिकी वायुसेना के बी-29 बमवर्षक विमान "बॉकस्कर" द्वारा सुबह ठीक 11:02 बजे यह हमला किया गया था। यह इतिहास का दूसरा और अब तक का अंतिम परमाणु हमला था, जो हिरोशिमा पर 6 अगस्त को गिराए गए पहले यूरेनियम बम के ठीक तीन दिन बाद हुआ। इस भीषण विस्फोट के प्रभाव से नागासाकी शहर का एक बड़ा हिस्सा पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील हो गया और अत्यधिक गर्मी तथा सदमे की लहरों के कारण लगभग 39,000 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। नागासाकी पर हमले के बाद तबाही का सिलसिला थमा नहीं, क्योंकि परमाणु विस्फोट से निकले बेहद खतरनाक विकिरण के संपर्क में आने के कारण आने वाले हफ्तों और महीनों में हजारों लोग गंभीर बीमारियों का शिकार होते रहे। साल 1945 के अंत तक इस हमले में मरने वालों और बुरी तरह प्रभावित होने वालों की कुल संख्या बढ़कर 74,000 से भी अधिक हो गई। इस अभूतपूर्व तबाही और भारी जनहानि के दबाव में आकर अंततः जापान के सम्र...

9 अगस्त 1831 को अमेरिका में पहली बार व्यावसायिक रूप से स्टीम इंजन यानी भाप से चलने वाली यात्री ट्रेन का सफल संचालन किया

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  9 अगस्त 1831 को अमेरिका में पहली बार व्यावसायिक रूप से स्टीम इंजन यानी भाप से चलने वाली यात्री ट्रेन का सफल संचालन किया गया था। इस ऐतिहासिक ट्रेन के इंजन का नाम डीविट क्लिंटन रखा गया था, जो न्यूयॉर्क के पूर्व गवर्नर के नाम पर आधारित था। अपनी पहली यात्रा के दौरान इस ट्रेन ने न्यूयॉर्क के अल्बानी से शेंगेक्टैडी के बीच लगभग 26 किलोमीटर की दूरी तय की थी। उस समय ट्रेन के डिब्बे आधुनिक रूप में नहीं थे, बल्कि घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले पारंपरिक स्टेजकोच यानी बग्घियों को पटरियों के अनुकूल बनाकर इंजन के पीछे जोड़ा गया था। यह इंजन ईंधन के रूप में लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल करता था और इसकी रफ्तार लगभग 19 से 48 किलोमीटर प्रति घंटा थी। इस घटना ने अमेरिका में कमर्शियल रेलवे युग की शुरुआत की और भविष्य में परिवहन के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया। #इतिहास #फैक्ट #इंजन #America #History #Fact #Engine

काकोरी कांड 9 अगस्त 1925

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  9 अगस्त 1925 को हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह सहित दस प्रमुख क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए काकोरी में एक बड़ी रणनीतिक कार्रवाई को अंजाम दिया था। क्रांतिकारी अपनी सशस्त्र क्रांति के लिए हथियार खरीदने और संगठन को मजबूत करने के लिए धन जुटाना चाहते थे, जिसके चलते उन्होंने शाहजहाँपुर से लखनऊ जा रही 8-डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन को काकोरी नामक रेलवे स्टेशन के पास चेन खींचकर जबरन रोक लिया। इसके बाद उन्होंने ट्रेन के गार्ड के डिब्बे में रखे ब्रिटिश सरकार के शाही खजाने की तिजोरी को सफलतापूर्वक लूट लिया, जिसमें कुल 4600 रुपये से अधिक की राशि शामिल थी। इस साहसिक कार्रवाई के दौरान दुर्घटनावश एक यात्री अहमद अली की गोली लगने से मौत हो गई थी, जिसके बाद ब्रिटिश प्रशासन में हड़कंप मच गया और इस पूरी घटना को इतिहास में 'काकोरी कांड' या वर्तमान आधिकारिक नाम 'काकोरी ट्रेन एक्शन' के रूप में दर्ज किया गया। इस घटना के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने देशव्यापी दमन चक्र ...