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30 अगस्त 1835 को मेलबर्न शहर की स्थापना

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  30 अगस्त 1835 को मेलबर्न शहर की स्थापना की गई थी। इसकी शुरुआत जॉन बैटमैन और जॉन पास्को फॉकनर के नेतृत्व में आए स्वतंत्र वासियों के एक समूह द्वारा हुई थी। स्थापना के शुरुआती दौर में इस जगह को 'बैटमेनिया' नाम से जाना जाता था, लेकिन साल 1837 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री लॉर्ड मेलबर्न के सम्मान में इसका नाम बदलकर आधिकारिक तौर पर 'मेलबर्न' रख दिया गया। ऐतिहासिक रूप से 30 अगस्त 1835 का दिन इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी दिन यारा नदी के किनारे पहला यूरोपीय घर बनाया गया था, जिसे आज के इस आधुनिक और भव्य शहर की वास्तविक शुरुआत माना जाता है। मेलबर्न शहर ऑस्ट्रेलिया (Australia) देश में आता है। यह ऑस्ट्रेलिया के 'विक्टोरिया' राज्य की राजधानी है और देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। #मेलबर्न #ऑस्ट्रेलिया #Australia #Melbourne #MelbourneHistory #Fact #History #factsinhindi

दो अलग-अलग घटनाएं कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का जीवंत नमूना

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  सियासत के रंगमंच पर पाखंड और सुविधा की राजनीति का गजब दौर चल रहा है, जहां दो अलग-अलग घटनाएं कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का जीवंत नमूना पेश करती हैं। पहला प्रहसन सोनिया गांधी की कथित आत्मकथा 'बिलांगिंग- अ जर्नी ऑफ लव' को लेकर सजाया जा रहा है। किस्सा यह है कि प्रकाशक संस्था पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया इसे भारत में छापने से पीछे हट गई, क्योंकि संपादक को कुछ अंशों पर आपत्ति थी और वे संदर्भ या प्रमाण मांग रहे थे। जब न तो स्रोत मिले और न ही सोनिया जी ने विवादित हिस्से हटाने की सहमति दी, तो प्रकाशक ने अपने कारोबारी नियम के तहत हाथ खींच लिए। किसी भी लेखक और संपादक के बीच तथ्य-पुष्टि की यह निहायत ही सामान्य पेशेवर प्रक्रिया होती है। हालांकि किसी भी पक्ष ने आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है और यह भी मुमकिन है कि पूरा ड्रामा केवल किताब को मुफ्त की पब्लिसिटी दिलाने का सस्ता स्टंट हो। मगर राहुल गांधी के दरबारी बौद्धिकों ने तुरंत राग अलाप दिया कि पेंग्विन यह सब मोदी सरकार के खौफ की वजह से कर रहा है। पूरी तरह से कॉर्पोरेट और कारोबारी सौदे वाले इस मसले में भी जबरन सत्ता के डर का नैरेटिव ठूंस दिय...

भारतीय रिसर्च इकोसिस्टम में चीन की घुसपैठ

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  वैश्विक शैक्षणिक परिदृश्य और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में अपना दबदबा कायम करने के लिए चीन एक सोची-समझी साजिश के तहत भारतीय रिसर्च इकोसिस्टम में घुसपैठ कर रहा है। सीमा और व्यापार के बाद अब चीन ने भारतीय शोधकर्ताओं और युवा प्राध्यापकों को निशाना बनाना शुरू किया है। भास्कर की एक विशेष पड़ताल में सामने आया है कि चीन एक सुनियोजित साइटेशन कार्टेल संचालित कर रहा है। इस नेटवर्क के जरिए भारतीय शोधकर्ताओं को ई-मेल भेजकर सहयोग का झांसा दिया जाता है और फिर पैसों का प्रलोभन देकर उनसे अपने रिसर्च पेपर्स में चीनी शोधपत्रों के अप्रासंगिक संदर्भ यानी साइटेशन जुड़वाए जाते हैं। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य कृत्रिम रूप से चीनी विश्वविद्यालयों और वहां के शोधकर्ताओं के साइटेशन इंडेक्स को बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल करना है। इस गुप्त सिंडिकेट की कार्यप्रणाली को उजागर करने के लिए जब भास्कर रिपोर्टर ने खुद को एक रिसर्च कंसल्टेंट के रूप में प्रस्तुत किया और चीन की साइंस एक्सप्लोर नामक एजेंसी से संपर्क साधा, तो बातचीत के लिए बाबरा नाम का एक चीनी एजेंट नियुक्त किया गया। इस एजेंट ने वॉ...

ब्रिटेन के आम ग्राहकों के लिए "इंडियन करी" का षड्यंत्र

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  ब्रिटेन की हर गली-नुक्कड़ पर दिखने वाले तथाकथित "इंडियन करी हाउस" का सच ब्रिटिश खान-पान के इतिहास का सबसे बड़ा और दिलचस्प विरोधाभास है। बाहर बोर्ड पर गर्व से "इंडियन रेस्टोरेंट" लिखा होता है, लेकिन किचन से लेकर गल्ले तक की कमान असल में बांग्लादेशी और पाकिस्तानी मूल के प्रवासियों के हाथों में होती है। आंकड़ों की हकीकत यह है कि ब्रिटेन के करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय रेस्टोरेंट का संचालन बांग्लादेशी, खासतौर पर सिलहट क्षेत्र से आए उद्यमी करते हैं, जबकि एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तानियों के नियंत्रण में है। यह कोई अनजाने में हुआ संयोग नहीं, बल्कि दशकों से चला आ रहा एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति और ब्रांडिंग का खेल है। इस मुखौटे की सबसे बड़ी वजह "इंडिया" नाम की ऐतिहासिक और वैश्विक ब्रांड वैल्यू है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर से ही अंग्रेजों के दिमाग में मसालों, समृद्ध संस्कृति और खान-पान की पहचान सीधे भारत से जुड़ी हुई थी। ब्रिटेन के आम ग्राहकों के लिए "इंडियन करी" एक जाना-पहचाना, भरोसेमंद और सकारात्मक स्वाद का प्रतीक बन चुका था। इसके विपरीत, 1947 के बंटव...

30 अगस्त 1659 को औरंगजेब के आदेश पर उसके सगे बड़े भाई दारा शिकोह की निर्ममता से हत्या

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 30 अगस्त 1659 को मुगल इतिहास की एक बेहद क्रूर और निर्णायक घटना घटी जब औरंगजेब के आदेश पर उसके सगे बड़े भाई दारा शिकोह की निर्ममता से हत्या कर दी गई। शाहजहां के बीमार पड़ते ही चारों भाइयों के बीच गद्दी के लिए भीषण गृहयुद्ध छिड़ गया था। दारा शिकोह शाहजहां के सबसे बड़े और पसंदीदा बेटे थे जिन्हें आधिकारिक तौर पर उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। वह स्वभाव से बेहद उदार, दार्शनिक और सूफी विचारधारा के समर्थक थे। उन्होंने हिंदू और इस्लाम धर्म की समानताओं को उजागर करने के लिए उपनिषदों और भगवद गीता का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया था, जिसे सिर्र-ए-अकबर यानी महान रहस्य नाम दिया गया। औरंगजेब एक कट्टर रूढ़िवादी और महत्वाकांक्षी शासक था, जो दारा शिकोह की इस उदारवादी धार्मिक नीति को इस्लाम के खिलाफ मानता था। औरंगजेब ने दारा शिकोह की हत्या केवल सत्ता हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि राजनैतिक और धार्मिक वर्चस्व को पूरी तरह स्थापित करने के लिए करवाई थी। औरंगजेब ने सामूगढ़ और देवराई के युद्धों में दारा शिकोह की सेना को बुरी तरह हरा दिया था। इसके बाद दारा शिकोह को बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया, जहां औरंगजेब न...

30 अगस्त 1574 को गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु बने थे

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  30 अगस्त 1574 को गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु बने थे, जिन्हें यह गुरुगद्दी अपने ससुर और तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी से प्राप्त हुई थी। सिख इतिहास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उन्होंने ही पवित्र शहर अमृतसर की स्थापना की थी, जिसे शुरुआती समय में 'रामदासपुर' के नाम से जाना जाता था। इसके साथ ही उन्होंने अमृतसर में पवित्र संतोखसर सरोवर की खुदाई का कार्य भी शुरू करवाया था। धार्मिक और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में उन्होंने सिख विवाह समारोह यानी आनंद कारज के दौरान पढ़ी जाने वाली चार 'लवाण' (फेरों के सूक्त) की रचना की थी, जिसका पालन आज भी सिख परंपराओं में पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है। #गुरुरामदास_जी #अमृतसर #रामदासपुर #इतिहास #GuruRamdasJi #Amritsar #Ramdaspur #History #Fact #HindiFact #factsinhindi #factsdaily #historyfacts #historyofindia

महान स्वतंत्रता सेनानी कनाईलाल दत्त

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  भारत माँ के वीर सपूत और महान स्वतंत्रता सेनानी कनाईलाल दत्त का जन्म 30 अगस्त 1888 को बंगाल के हुगली जिले के चंदननगर में हुआ था। वह देश की आजादी के लिए मात्र 20 वर्ष की आयु में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। अपने छात्र जीवन के दौरान ही वह बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन 'अनुशीलन समिति' और 'युगांतर' समूह के सक्रिय सदस्य बन गए थे, जहाँ उन्होंने 1905 में हुए बंगाल विभाजन का कड़ा विरोध किया था। साल 1908 में मुजफ्फरपुर के दमनकारी अंग्रेज मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड पर हुए हमले के बाद ब्रिटिश सरकार ने कड़ी कार्रवाई की। इस अलीपुर बम कांड के सिलसिले में कनाईलाल दत्त, अरविन्द घोष और बारीन्द्र कुमार घोष सहित कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर अलीपुर जेल में डाल दिया गया। इसी दौरान जेल में बंद क्रांतिकारियों में से एक, नरेन्द्र नाथ गोस्वामी (नरेन), अंग्रेजों का सरकारी मुखबिर बन गया और उसने दल के कई गुप्त राज अंग्रेजों के सामने उगल दिए। क्रांतिकारी आंदोलन और अपने साथियों को सुरक्षित रखने के लिए कनाईलाल दत्त और सत्येन्द्रनाथ बोस ने जेल के भीतर ही एक साहसिक योजना बनाई। उन्होंन...