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मानसून सत्र का हंगामे की भेंट चढ़ना

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 मानसून सत्र का हंगामे की भेंट चढ़ना और लोकसभा की उत्पादकता का गिरकर महज 15 प्रतिशत पर आ जाना भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे निराशाजनक अध्यायों में से एक है। पिछले 22 वर्षों में यह अब तक का सबसे निचला स्तर है, जो सीधे तौर पर इस बात को उजागर करता है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत को किस तरह राजनीतिक खींचतान का अखाड़ा बना दिया गया। संसद के संचालन पर प्रतिदिन लगभग 9 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जो सीधे तौर पर जनता के पसीने की कमाई और टैक्स का पैसा है। सत्र के दौरान लगातार वेल में आकर नारेबाजी करना, तख्तियां दिखाना और कार्यवाही को बार-बार स्थगित कराने की रणनीति ने इस भारी-भरकम बजट और अनमोल विधायी समय को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। इस पूरे गतिरोध में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और उसके शीर्ष नेता राहुल गांधी, साथ ही समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव जैसे विपक्षी चेहरों की भूमिका पर सीधे तौर पर सवाल उठते हैं। जनता ने इन नेताओं और सांसदों को चुनकर इसलिए भेजा था ताकि वे देश की बुनियादी समस्याओं, विकास योजनाओं और जनकल्याणकारी नीतियों पर नियम और कानून बनाने में अपनी भागीदारी निभाएं। लेकिन नीतिगत बहस...

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा Vs कामकोटि

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 संसद के पवित्र सदन में जब ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए थी, तब जनसेवा के नाम पर राजनीति का ककहरा सीख रही कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपनी अद्भुत और असीमित बौद्धिक क्षमता का परिचय दे डाला। एंटी-पेपर लीक बिल जैसे गंभीर मुद्दे पर ठोस बात करने के बजाय उन्होंने आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि पर तंज कसते हुए उन्हें 'गोमूत्र-एक्सपर्ट' की उपाधि दे डाली। यह वही तथाकथित 'गोमूत्र विशेषज्ञ' हैं जो कंप्यूटर आर्किटेक्चर, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी और देश के पहले स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर 'शक्ति' के जनक हैं, लेकिन शायद चुनावी रैलियों में ताली बटोरने वाली राजनीति के लिए विज्ञान की यह भाषा बेहद जटिल थी। प्रियंका गांधी ने बड़े गर्व से सवाल उछाला था कि आखिर इस 'एक्सपर्ट' को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा, मानो देश की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान को चलाने वाले वैज्ञानिक से ज्यादा शिक्षा की समझ सिर्फ परिवारवाद की छत्रछाया में पलने वाले नेताओं को ही होती है। जिस प्रोफेसर कामकोटि के एक पुराने वीडियो में 'नेचर' जैसे विश्व प्रसिद्ध जर्नल के वैज्ञानिक त...

पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए

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 पाकिस्तान के हुक्मरानों की बयानबाजी भी किसी अजब-गजब नाटक से कम नहीं लगती। जिस मुल्क की पूरी राजनीति और अस्तित्व ही भारत-विरोध की जमीन पर टिका हो, उसके वजीर-ए-आजम अपनी खोखली धमकियों को वजनदार बनाने के लिए भारतीय संस्कृति के महाकाव्य रामायण से उधार ली गई लक्ष्मण रेखा का मुहावरा इस्तेमाल कर रहे हैं। पानी की हर एक बूंद को अपनी संप्रभुता बताने वाले यह भूल जाते हैं कि जिस पानी पर वे अपनी जागीर का दावा ठोक रहे हैं, वह दशकों से सिंधु जल समझौते के तहत भारत के संयम और सद्भाव की बदौलत ही उनकी तरफ बह रहा है। अपनी जनता को बुनियादी जरूरतें देने में नाकाम हुकूमत जब भारत को अक्ल सिखाने और सीधा जवाब देने की गर्जना करती है, तो दुनिया डरने के बजाय केवल ठहाके लगाती है। हकीकत तो यह है कि पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए। कराची की सड़कों पर बूंद-बूंद के लिए टैंकर माफिया आम अवाम को लूट रहा है, सिंध और पंजाब प्रांतों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर आए दिन तलवारें खिंच जाती हैं, और बलूचिस्तान के लोग एक घूंट साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। दशकों से जो मुल्क अ...

1983 के गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो से गले मिलते हुए

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 कूटनीति और सार्वजनिक विमर्श के दोहरे मापदंडों पर यदि कभी खुली चर्चा हो, तो वर्तमान राजनीति के कुछ चेहरे पूरी तरह बेनकाब नजर आते हैं। जब इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए, तो 1983 के गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो के बीच हुए उस बहुचर्चित गले मिलने को कांग्रेस दशकों तक अपनी कूटनीतिक जीत और वैश्विक प्रभाव के रूप में प्रस्तुत करती रही है। उस समय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों और आत्मीयता को विदेश नीति की परिपक्वता बताया गया था। लेकिन आज जब वही राजनीतिक विरासत संभालने वाले नेता राहुल गांधी मंचों से अंतरराष्ट्रीय स्तर की महिला नेताओं और राजनयिक शिष्टाचार पर स्तरहीन टिप्पणियां करते हैं, तो उनकी समझ और कथनी-करनी का खोखलापन साफ दिखाई देने लगता है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर सार्वजनिक मंचों से जिस तरह की हल्की, फूहड़ और अशोभनीय बयानबाजी की गई, उसने राजनीतिक विमर्श के स्तर को बेहद नीचे गिरा दिया है। सवाल यह उठता है कि यदि ठीक उसी तरह की द्विअर्थी और भद्दी टिप्पणियां कभी हवाना में इं...

14 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान एक पृथक् और नया राष्ट्र बना

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 14 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान एक पृथक् और नया राष्ट्र बना, जबकि इसके अगले ही दिन 15 अगस्त 1947 को भारत को आधिकारिक तौर पर अपनी स्वतंत्रता मिली। इस ऐतिहासिक और दर्दनाक बंटवारे के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा का निर्धारण करने के लिए सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में रेडक्लिफ रेखा खींची गई, जिसने मुख्य रूप से पंजाब और बंगाल प्रांतों को दो हिस्सों में बांट दिया था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन हुआ, जिसमें करोड़ों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सीमा के पार जाना पड़ा और इस दौरान भड़की भारी हिंसा में लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस दर्दनाक त्रासदी, विस्थापन के दर्द और पीड़ितों के बलिदान को याद करते हुए भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाया जाता है। #विभाजन_विभीषिका_दिवस #भारत #हिन्दू #विभाजन

15 अगस्त 1947 को आजादी मिली लेकिन लाखों लोगों तो पता ही नहीं था कि वह भारत में है या पाकिस्तान में

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 14 अगस्त की वह काली आधी रात जिसे इतिहास की किताबों में आजादी का जश्न बताया गया, वास्तव में लाखों मासूमों की नियति के साथ खेला गया इतिहास का सबसे खौफनाक और घिनौना मजाक था। जब राजधानी के सत्ता के गलियारों में आजादी के तराने गाए जा रहे थे, ठीक उसी वक्त सरहदों पर बसी करोड़ों की आबादी इस मुगालते में जी रही थी कि अगली सुबह उनका वजूद किस मुल्क का हिस्सा होगा। ब्रिटिश हुकूमत के प्यादे सिरिल रेडक्लिफ ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर महज पांच हफ्तों के भीतर एक प्राचीन सभ्यता के सीने पर नक्शों और स्याही की ऐसी खूनी लकीर खींच दी, जिसने सदियों पुराने रिश्तों, आस्थाओं और जिंदगियों को बेरहमी से काट कर रख दिया। सबसे बड़ा षड्यंत्र तो यह था कि विभाजन की यह रिपोर्ट 12 अगस्त को ही मुकम्मल हो चुकी थी, मगर सत्ता के ठेकेदारों ने दंगों और बगावत के खौफ से इसे 17 अगस्त तक एक गहरी तिजोरी में दबाए रखा। आजादी के दिन किसी आम इंसान को यह खबर तक नहीं थी कि उसका अपना घर किस देश की जमीन पर खड़ा है, और उस दौर के सबसे बड़े नेता मोहनदास करमचंद गांधी भी इस भयावह धोखे पर पूरी तरह खामोश रहे। इस आपराधिक गोपनीयता ने जमीन पर...

14 अगस्त 1947 मुख्य ध्वजस्तंभ से ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीक 'यूनियन जैक' को आधिकारिक रूप से नीचे उतारा गया था।

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 14 अगस्त 1947 की शाम भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और भावुक क्षणों में से एक थी। इसी दिन नई दिल्ली स्थित वायसराय हाउस (जिसे अब राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता है) के मुख्य ध्वजस्तंभ से ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीक 'यूनियन जैक' को आधिकारिक रूप से नीचे उतारा गया था। यह केवल एक कपड़े के टुकड़े को उतारना नहीं था, बल्कि भारत की भूमि पर पिछले लगभग दो सौ वर्षों से चले आ रहे औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन और उसकी संप्रभुता के अंत की एक औपचारिक और वैश्विक घोषणा थी। इस ऐतिहासिक घटना को देखने और इतिहास को बदलते हुए महसूस करने के लिए वहां बड़ी संख्या में लोग और गणमान्य नागरिक मौजूद थे, जो सदियों की गुलामी के बाद आजादी की नई सुबह का इंतजार कर रहे थे। इसके तुरंत बाद 14 और 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को नई दिल्ली के काउंसिल हाउस (अब पुराना संसद भवन) के केंद्रीय कक्ष में संविधान सभा का एक विशेष और ऐतिहासिक सत्र आयोजित किया गया। रात के ठीक बारह बजते ही जब पूरी दुनिया सो रही थी, तब भारत ने जीवन और स्वतंत्रता में कदम रखा और देश की सत्ता पूरी तरह से भारतीय नेताओं के हाथों में सौंप दी गई। इसी सत्र में द...