सरदार पटेल और नेहरू के बीच वैचारिक टकराव



सरदार पटेल और नेहरू के बीच वैचारिक टकराव का एक दृष्टांत

(आधार: धर्मसिंह तोमर की डायरी, "इतिहास की अनकही सत्य कहानियाँ")

सन 1947 का वह दौर भारत के इतिहास में असाधारण था — सत्ता हस्तांतरण, भारत का विभाजन, सांप्रदायिक उन्माद और करोड़ों लोगों का विस्थापन। ऐसे ही एक प्रसंग में दिल्ली की एक गली में रिक्शा पर बैठे सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को आवाज दी – “आइये नेहरू जी, चलें।” लेकिन नेहरू पीछे हटते हुए बोले कि वे खान अब्दुल गफ्फार खान से कोई "जरूरी बात" कर रहे हैं। सरदार पटेल ने सहजता से पूछा, “ऐसी क्या ज़रूरी बात है?” नेहरू ने बताया कि खान अब भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने की ज़िद पर अड़े हैं और वे उन्हें मनाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे भारत में ही रहें।

इस पर पटेल ने दो टूक कहा, “तो जाने दीजिए। जब पाकिस्तान बन ही गया है, तो जो जाना चाहे, जाए।” लेकिन नेहरू ने चिंता जताई कि यदि खान साहब चले गए, तो उनके साथ करीब पाँच लाख मुसलमान भी पाकिस्तान चले जाएंगे। इस पर पटेल ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए उत्तर दिया – “तो जाने दीजिए।” नेहरू ने आशंका जताई कि “दिल्ली खाली हो जाएगी।” तब पटेल ने तथ्यपूर्ण उत्तर दिया – “लाहौर से जो हिंदू आ रहे हैं, वे दिल्ली को फिर से बसा देंगे।”


इस बिंदु पर बहस और गंभीर हो गई। नेहरू ने कहा कि वे पाकिस्तान से आए हिंदुओं को मुस्लिमों के खाली किए घर नहीं देंगे; वह संपत्ति वक्फ बोर्ड को सौंप दी जाएगी। इस पर सरदार पटेल ने कटाक्ष किया कि “फिर लाहौर में मंदिरों और डीएवी स्कूल पर जो कब्जा कर लिया गया, उनके नाम इस्लामिक रख दिए गए, उसका क्या?” लेकिन नेहरू ने फिर वही आदर्शवादी रुख अपनाया – “हमें पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं, हम तो भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाएंगे।”


इस पर सरदार पटेल ने स्पष्टता से ऐतिहासिक सत्य को दोहराया – “जब देश का विभाजन ही धर्म के आधार पर हुआ है, तो अब यह भारत हिंदुओं का है — एक ऐसा राष्ट्र जहाँ उनके अधिकार, सुरक्षा और अस्मिता सुनिश्चित हो।” लेकिन नेहरू ने एक आत्ममुग्ध उत्तर दिया – “नहीं, यह देश कांग्रेस का है और कांग्रेस जैसा चाहेगी, वैसा ही होगा।”


इस पर सरदार पटेल ने इतिहास का गूढ़ सत्य समझाया — “इतिहास बदलता है। मुसलमान साढ़े सात सौ साल में चले गए, अंग्रेज 200 साल में गए। कांग्रेस 60-70 साल में चली जाएगी, और लोग उसे भी भूल जाएंगे।" नेहरू ने प्रतिवाद किया – “ऐसा कभी नहीं होगा।” लेकिन पटेल ने अंतिम चोट की — “आप मुगल मानसिकता छोड़ दीजिए।”


फिर उन्होंने रिक्शा चालक से कहा – “चलिए भैया, तेज़ चलो… हम भी किससे बहस में पड़ गए।”


यह संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के दो शीर्ष नेताओं की वैचारिक दिशाओं का टकराव था। एक ओर नेहरू थे, जिनकी सोच आदर्शवादी, वामपंथी और धर्मनिरपेक्षता के खोखले आग्रह से ओतप्रोत थी; दूसरी ओर थे सरदार पटेल — एक ज़मीनी नेता, जो यथार्थ को पहचानते थे और राष्ट्र की अस्मिता को प्राथमिकता देते थे।


वक्फ बोर्ड, पुनर्वास, सांप्रदायिक संतुलन, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जैसे विषयों की जड़ें उसी कालखंड में पनपीं। 


एक बार पटेल ने स्पष्ट कहा था –

❝“जब पाकिस्तान बन गया, तो अब भारत का शासन केवल भारतवासियों के हित में होना चाहिए, न कि अल्पसंख्यकों को खुश रखने के लिए।”❞

(Constituent Assembly Debates, 1947)


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