डॉलर दुनिया की सबसे ताक़तवर मुद्रा क्यों?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पूरी दुनिया बर्बाद थी, तब एक देश था जिसके पास 22,000 टन सोना जमा हो चुका था – अमेरिका। यूरोपीय देश अपने युद्ध के लिए हथियार ख़रीदने के लिए अपना सोना बेच चुके थे… किसे? – अमेरिका को।
युद्ध के बाद वाशिंगटन में एक बैठक हुई। सवाल उठा – अब दुनिया किस मुद्रा में व्यापार करेगी? ब्रिटेन का पाउंड टूट चुका था, कमज़ोर था। ऐसे में अमेरिका ने प्रस्ताव रखा – “डॉलर में व्यापार करो।” और क्या कहा? – “जो भी देश चाहे, 35 डॉलर देकर 28 ग्राम सोना ले सकता है।”
दुनिया मान गई। और यहीं से डॉलर एक सामान्य मुद्रा नहीं, ‘वैश्विक शक्ति’ बन गया।
लेकिन 1960 आते-आते सोने के दाम बढ़ने लगे। अब लोग 35 डॉलर में अमेरिका से सोना खरीदते और लंदन में 40 डॉलर में बेच देते। अमेरिका को खतरा महसूस हुआ क्योंकि उसका सोना तेजी से निकल रहा था।
समस्या क्या थी? ब्रिटेन को उस समय लोन चाहिए था।
लोन देने के बदले में अमेरिका ने लंदन का गोल्ड मार्केट ही बंद करवा दिया।
इसी सौदेबाज़ी की वजह से आज भी अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्ते अटूट हैं – क्योंकि मजबूरी के साथी कभी एक-दूसरे को नहीं छोड़ते।
फिर आया वो दिन, 15 अगस्त 1971 – जब अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एकतरफा ऐलान कर दिया कि अब डॉलर के बदले सोना नहीं मिलेगा।
विश्व इतिहास का सबसे बड़ा वित्तीय धोखा।
पर दुनिया चुप रही, क्योंकि हर देश डॉलर लेकर बैठा था और ना उसे जलाकर फेंक सकता था, ना बदल सकता था। डॉलर को बचाना अब अमेरिका का नहीं, दुनिया का सिरदर्द बन गया था।
तभी मध्य पूर्व में तेल निकला। राजशाही थी, तानाशाही थी, विद्रोह का डर था। अमेरिका आया और कहा – “हम सुरक्षा देंगे, बदले में तुम तेल सिर्फ डॉलर में बेचो।” और ये सौदा भी हो गया।
अब दुनिया को तेल चाहिए और तेल मिलेगा केवल डॉलर में।
तो हर देश को डॉलर इकट्ठा करना ही पड़ा। इसे कहते हैं – “पेट्रो-डॉलर का खेल।”
बैंकिंग बढ़ी, तो अमेरिका ने SWIFT सिस्टम को नियंत्रित किया – आज भी आप अगर भारत से न्यूजीलैंड पैसे भेजते हैं, तो वो पैसा पहले अमेरिका से होकर जाता है। क्यों?
क्योंकि डॉलर ही उस रास्ते की चाबी है।
लेकिन अब भारत जागा है।
नरेंद्र मोदी सरकार UPI लाई। वो UPI जो अब सिर्फ भारत में नहीं, दुबई, सिंगापुर, मलेशिया और फ्रांस तक पहुँच रहा है। और यही अमेरिका को डराता है।
अब सोचिए जब राहुल गांधी या चिदंबरम जैसे नेता UPI की आलोचना करते हैं, तब वो किसकी भाषा बोलते हैं?
ये लोग मूर्ख नहीं हैं। ये बस अमेरिका के डॉलर का नमक खा रहे हैं।
सद्दाम हुसैन को मारने के लिए अमेरिका को 25 साल नहीं लगे। जब तक वो डॉलर में तेल बेचता रहा, तब तक लोकतंत्र की चिंता किसी को नहीं थी। लेकिन जब उसने यूरो में तेल बेचने की कोशिश की…
तो “लोकतंत्र की रक्षा” के नाम पर बम बरसाए गए।
अमेरिका लोकतंत्र के लिए नहीं लड़ता, डॉलर के लिए लड़ता है।
अब सवाल उठता है हम क्या करें? तो सुनिए…
भारत आज एक नई राह पर है। हमें अमेरिका जैसा दिखना है – लेकिन अमेरिका बनना नहीं है। हमें अपनी राह खुद बनानी है।
नूपुर शर्मा प्रकरण में थोड़ी कूटनीतिक नरमी हमें इसलिए दिखानी पड़ी, क्योंकि हमें अरब देशों से अच्छे संबंध चाहिए – ताकि UPI वहाँ भी चले, तेल भी मिले और आत्मनिर्भरता भी बढ़े।
हमें यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और दुनिया को 1947 वाला विश्वसनीय भारत दिखाना है ताकि वे हमारे साथ व्यापार करें, लेकिन हमें किसी का पिछलग्गू नहीं बनना है।
राहुल गांधी आपको जात-पात में उलझाएंगे…
कभी उद्योगपतियों को गाली देंगे…
कभी मणिपुर जैसा राज्य जलाने की कोशिश होगी…
लेकिन आपको समझना होगा –
ये केवल आंतरिक राजनीति नहीं, ये अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र हैं।
आज हमें सजग रहना है, एकजुट रहना है।
हम सुपरपावर बनें या नहीं – ये बाद में देखेंगे।
लेकिन आज हम चुप रहकर देश का सौदा नहीं कर सकते।
अमेरिका ने डॉलर को बचाने के लिए अरबों डॉलर खर्च किए।
तो हम भी भारत को बचाने के लिए थोड़ी एकता, थोड़ी बुद्धिमानी और थोड़ी राष्ट्रभक्ति खर्च कर ही सकते हैं।
भारत बदल रहा है और ये बदलाव केवल मोदी नहीं लाए…
इस बदलाव के सूत्रधार भारत के जागरूक नागरिक है जो जातिवाद, परिवारवाद की राजनीति को अच्छे से समझकर देश विरोधियों को सबक सिखाते है।
--- लोकेश कुशवाहा

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