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शादी में तोरण मारने का कारण जानिए

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शादी मे तोरण पर तलवार से 3 बार दूल्हावार करने की असलियत का नही पता। आजकल ब्राहमणों ने सिर्फ शादी ब्याह कराना 1 पेशा समझ लिया है। प्राचीन कथा के अनुसार कहा जाता है कि तोरण नाम का 1 राक्षस था, जो की शादी के समय दुल्हन के घर के दरवाजे पर तोते का रूप धारण कर के बैठ जाता था और जब दूल्हा द्वार पर आता तो वह उसके शरीर में घुस कर के दुल्हन से खुद शादी रचाकर उसे परेशान करता था। 1 बार एक साहसी, वीर और चतुर राजकुमार की शादी के समय जब दुल्हन के घर में प्रवेश कर रहा था तभी उसकी नजर उस राक्षसी तोते पर पड गयी और उसने तुरंत तलवार निकालकर उस तोते को मार गिराया और शादी कर ली। कहा जाता है कि उसी दिन से ही तोरण मारने की परंपरा शुरू हो गयी जो आज तक चल रही है। आप सभी कभी गौर किया हो तो आपको पता लगेगा कि इस रस्म में दुल्हन के घर के दरवाजे पर लकड़ी का तोरण लगाया जाता है, जिस पर एक तोता होता है जो राक्षस का प्रतीक होता है। बगल में दोनों तरफ छोटे तोते होते हैं। दूल्हा शादी के समय तलवार से उस लकड़ी के बने राक्षस रूपी तोते को मारने की रस्म पूर्ण करता है। गांवों में तोरण का निर्माण खाती करता है, लेकिन आ...

नीरा आर्य की कहानी

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इतनी यातनाएं दी गईं और नेहरू कहता है चरखा से आजादी मिली..??  स्वाधीनता संग्राम की मार्मिक गाथा। नीरा आर्य (१९०२ - १९९८) की संघर्ष पूर्ण जीवनी: नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी | नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है | इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है - 5 मार्च 1902 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के खेकड़ा नगर में एक प्रतिष्ठित व्यापारी सेठ छज्जूमल के घर जन्मी नीरा आर्य आजाद हिन्द फौज में रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही थीं, जिन पर अंग्रेजी सरकार ने गुप्तचर होने का आरोप भी लगाया था। इन्हें नीरा ​नागिनी के नाम से भी जाना जाता है। इनके भाई बसंत कुमार भी आजाद हिन्द फौज में थे। इनके पिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। खासकर कलकत्ता में इनके पिताजी के व्यापार का मुख्य केंद्र था, इसलिए इनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता में ही हुई। नीरा नागिन और इनके ...

आज़ाद सरकार के पहले प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष चंद्र

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क्या आप जानते है? भारत की पहली आज़ाद सरकार के, पहले प्रधानमंत्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे. इस सरकार को 'आज़ाद हिंद सरकार' कहा जाता है. ये सरकार 21 अक्टूबर 1943 को बनी थी. उस वक्त 9 देशों की सरकारों ने सुभाष चंद्र बोस की सरकार को अपनी मान्यता दी थी। जापान ने 23 अक्टूबर 1943 को आज़ाद हिंद सरकार को मान्यता दी . उसके बाद जर्मनी, फिलीपींस, थाईलैंड, मंचूरिया, और क्रोएशिया ने भी आज़ाद हिंद सरकार को अपनी मान्यता दे दी। सुभाष चंद्र बोस ने बर्मा की राजधानी रंगून को अपना हेडक्वार्टर बनाया, सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद हिंद सरकार के पहले प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री थे . लेफ्टिनेंट कर्नल ए सी चटर्जी आज़ाद हिंद सरकार के वित्त मंत्री थे। एस ए अय्यर आज़ाद हिंद सरकार के प्रचार मंत्री थे। रास बिहारी बोस को आज़ाद हिंद सरकार का सलाहकार बनाया गया था . इस सरकार की स्थापना करते वक्त नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने ये शपथ ली थी कि 'ईश्वर के नाम पर मैं ये पवित्र शपथ लेता हूं कि भारत और उसके 38 करोड़ लोगों को आज़ाद करवाऊँगा' आज़ाद हिंद सरकार ने ये तय किया था कि तिरंगा झंडा, भारत का ...

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छाती 56 इंच की ही है

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#प्रधानमंत्री_नरेन्द्र_मोदी_की_छाती_56_इंच_की_ही_है। पोस्ट के मुद्दे पर आने से पहले यह समझना जरूरी है कि... अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ एक सुनियोजित षड्यंत्र एवं रणनीति के तहत एक सुसंगठित दुष्प्रचार अभियान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बहुत लम्बे समय से चल रहा है कि ट्रम्प झक्की है, ट्रम्प सनकी है, ट्रम्प आधा पागल है... ट्रम्प को यह नहीं आता... ट्रम्प को वह नहीं आता... आदि आदि। लेकिन इसके ठीक विपरीत मेरा मानना है कि डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी हितों के प्रति शत प्रतिशत समर्पित एक अत्यन्त कुशल कठोर और बहुत अहंकारी शासक है। केवल 3 वर्ष के अपने कार्यकाल में ट्रम्प ने अपनी आर्थिक रणनीति से आज डॉलर को उस स्थिति पर पहुंचा दिया है जहां पाउंड, यूरो, येन, रूबल,चाइनीज युआन समेत दुनिया के सभी शक्तिशाली देशों की करेंसी डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर हुईं हैं। सम्भवतः कई दशकों बाद अमेरिकी डॉलर का ऐसा जलवा देखने को मिल रहा है। राजनीतिक/कूटनीतिक/सामरिक मोर्चे पर डोनाल्ड ट्रम्प ने  उस उत्तर कोरिया को घुटनों पर ला दिया है जिस उत्तर कोरिया को लाख प्रयासों के बावजूद पिछले लगभग 50 वर्षों से अम...

सुभाष चन्द्र बोस की पत्नी एमिली शेंकल का जीवन

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बात 1947 से पहले की है.....यह कहानी एक जर्मन महिला की है, जिनका नाम था (Emilie_Schenkl) एमिली शेंकल     ..... मुझे नहीं पता आपमें से कितनों ने ये नाम सुना है.... और अगर नहीं सुना है तो आप दोषी नहीं । इस नाम को इतिहास से खुरच कर निकाल फेंका गया..... श्रीमती एमिली शेंकल ने 1937 में भारत माँ के लाड़ले बेटे सुभाष चन्द्र बोस से विवाह किया और एक ऐसे देश को ससुराल के रूप में चुना जिसने कभी इस बहू का स्वागत नहीं किया.... न बहू के आगमन में किसी ने मंगल गीत गाये और न उसकी बेटी के जन्म पर कोई सोहर गायी गयी....... कभी कहीं जन मानस में चर्चा तक नहीं हुई कि वो कैसे जीवन गुजार रही हैं....... सात साल के कुल वैवाहिक जीवन में सिर्फ 3 साल ही उन्हें अपने पति के साथ रहने का अवसर मिला फिर उन्हें और नन्हीं सी बेटी को छोड़ पति देश के लिए लड़ने चला आए इस वायदे के साथ कि पहले देश को आज़ाद करा लूँ फिर तो सारा जीवन तुम्हारे साथ बिताना ही है..... पर ऐसा हुआ नहीं औऱ 1945 में एक कथित विमान दुर्घटना में वो लापता हो गए......! उस समय एमिली शेंकल बेहद युवा थीं चाहतीं तो यूरोपीय संस्कृति के हिसाब से द...

विभाजन के बाद 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की हत्याओं

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"विभाजन के बाद 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की हत्याओं, लड़कियों से बलात्कार का नंगा नाच हो रहा था। लाहौर से हर ट्रैन में लाशें और उन पर मंडराते कुत्ते, गिद्ध दिखाई दे रहे थे तब नेहरू जी ने रेडियो पर शरणार्थी शिविरों में रह रहे हिंदुओं से धैर्य और शांति बनाये रखने की अपील की। दूसरे दिन वो शिविरों में इंदिरा  के साथ गए। वहां नेहरू तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश में एक 80 वर्षीय वृद्ध ने इंदिरा को स्पर्श कर दिया। नेहरू ने तुरंत ही उसे तमाचा जड़ दिया। वो वृद्ध लाहौर का प्रसिद्ध व्यापारी था जिस पर वक़्त की मार पड़ रही थी। तमाचा खा कर वो जोर से हंसा और बोला, "इंदिरा मेरी पोती समान है क्योंकि आप खुद मेरे बेटे की उम्र के हैं। मेरा हाथ लग जाने भर से आप क्रोधित हो गए और मेरी 3 जवान पोतियों को मुसलमान मेरे सामने उठा ले गए फिर भी आप कहते हैं सब भुला दूं।" नेहरू ये सुनकर वहां से इंदिरा को साथ लेकर निकल गए। -अश्व घोष की पुस्तक "द कुरान एंड द काफिर" के अंश

कौन था मुन्ना बजरंगी

मुन्ना बजरंगी का असली नाम प्रेम प्रकाश सिंह है. उसका जन्म 1967 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के पूरेदयाल गांव में हुआ था. उसके पिता पारसनाथ सिंह उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बनाने का सपना संजोए थे. मगर प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी ने उनके अरमानों को कुचल दिया. उसने पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी. किशोर अवस्था तक आते आते उसे कई ऐसे शौक लग गए जो उसे जुर्म की दुनिया में ले जाने के लिए काफी थे. मुन्ना को हथियार रखने का बड़ा शौक था. वह फिल्मों की तरह एक बड़ा गैंगेस्टर बनना चाहता था. यही वजह थी कि 17 साल की नाबालिग उम्र में ही उसके खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया. जौनपुर के सुरेही थाना में उसके खिलाफ मारपीट और अवैध असलहा रखने का मामला दर्ज किया गया था. इसके बाद मुन्ना ने कभी पलटकर नहीं देखा. वह जरायम के दलदल में धंसता चला गया. अस्सी के दशक में की थी पहली हत्या मुन्ना अपराध की दुनिया में अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगा था. इसी दौरान उसे जौनपुर के स्थानीय दबंग माफिया गजराज सिंह का संरक्षण हासिल हो गया. मुन्ना अब उसके लिए काम करने लगा था. इसी दौरान 1984 में मुन्ना ने लूट के ल...