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Showing posts from August, 2026

30 अगस्त 1835 को मेलबर्न शहर की स्थापना

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  30 अगस्त 1835 को मेलबर्न शहर की स्थापना की गई थी। इसकी शुरुआत जॉन बैटमैन और जॉन पास्को फॉकनर के नेतृत्व में आए स्वतंत्र वासियों के एक समूह द्वारा हुई थी। स्थापना के शुरुआती दौर में इस जगह को 'बैटमेनिया' नाम से जाना जाता था, लेकिन साल 1837 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री लॉर्ड मेलबर्न के सम्मान में इसका नाम बदलकर आधिकारिक तौर पर 'मेलबर्न' रख दिया गया। ऐतिहासिक रूप से 30 अगस्त 1835 का दिन इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी दिन यारा नदी के किनारे पहला यूरोपीय घर बनाया गया था, जिसे आज के इस आधुनिक और भव्य शहर की वास्तविक शुरुआत माना जाता है। मेलबर्न शहर ऑस्ट्रेलिया (Australia) देश में आता है। यह ऑस्ट्रेलिया के 'विक्टोरिया' राज्य की राजधानी है और देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। #मेलबर्न #ऑस्ट्रेलिया #Australia #Melbourne #MelbourneHistory #Fact #History #factsinhindi

दो अलग-अलग घटनाएं कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का जीवंत नमूना

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  सियासत के रंगमंच पर पाखंड और सुविधा की राजनीति का गजब दौर चल रहा है, जहां दो अलग-अलग घटनाएं कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का जीवंत नमूना पेश करती हैं। पहला प्रहसन सोनिया गांधी की कथित आत्मकथा 'बिलांगिंग- अ जर्नी ऑफ लव' को लेकर सजाया जा रहा है। किस्सा यह है कि प्रकाशक संस्था पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया इसे भारत में छापने से पीछे हट गई, क्योंकि संपादक को कुछ अंशों पर आपत्ति थी और वे संदर्भ या प्रमाण मांग रहे थे। जब न तो स्रोत मिले और न ही सोनिया जी ने विवादित हिस्से हटाने की सहमति दी, तो प्रकाशक ने अपने कारोबारी नियम के तहत हाथ खींच लिए। किसी भी लेखक और संपादक के बीच तथ्य-पुष्टि की यह निहायत ही सामान्य पेशेवर प्रक्रिया होती है। हालांकि किसी भी पक्ष ने आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है और यह भी मुमकिन है कि पूरा ड्रामा केवल किताब को मुफ्त की पब्लिसिटी दिलाने का सस्ता स्टंट हो। मगर राहुल गांधी के दरबारी बौद्धिकों ने तुरंत राग अलाप दिया कि पेंग्विन यह सब मोदी सरकार के खौफ की वजह से कर रहा है। पूरी तरह से कॉर्पोरेट और कारोबारी सौदे वाले इस मसले में भी जबरन सत्ता के डर का नैरेटिव ठूंस दिय...

भारतीय रिसर्च इकोसिस्टम में चीन की घुसपैठ

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  वैश्विक शैक्षणिक परिदृश्य और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में अपना दबदबा कायम करने के लिए चीन एक सोची-समझी साजिश के तहत भारतीय रिसर्च इकोसिस्टम में घुसपैठ कर रहा है। सीमा और व्यापार के बाद अब चीन ने भारतीय शोधकर्ताओं और युवा प्राध्यापकों को निशाना बनाना शुरू किया है। भास्कर की एक विशेष पड़ताल में सामने आया है कि चीन एक सुनियोजित साइटेशन कार्टेल संचालित कर रहा है। इस नेटवर्क के जरिए भारतीय शोधकर्ताओं को ई-मेल भेजकर सहयोग का झांसा दिया जाता है और फिर पैसों का प्रलोभन देकर उनसे अपने रिसर्च पेपर्स में चीनी शोधपत्रों के अप्रासंगिक संदर्भ यानी साइटेशन जुड़वाए जाते हैं। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य कृत्रिम रूप से चीनी विश्वविद्यालयों और वहां के शोधकर्ताओं के साइटेशन इंडेक्स को बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल करना है। इस गुप्त सिंडिकेट की कार्यप्रणाली को उजागर करने के लिए जब भास्कर रिपोर्टर ने खुद को एक रिसर्च कंसल्टेंट के रूप में प्रस्तुत किया और चीन की साइंस एक्सप्लोर नामक एजेंसी से संपर्क साधा, तो बातचीत के लिए बाबरा नाम का एक चीनी एजेंट नियुक्त किया गया। इस एजेंट ने वॉ...

ब्रिटेन के आम ग्राहकों के लिए "इंडियन करी" का षड्यंत्र

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  ब्रिटेन की हर गली-नुक्कड़ पर दिखने वाले तथाकथित "इंडियन करी हाउस" का सच ब्रिटिश खान-पान के इतिहास का सबसे बड़ा और दिलचस्प विरोधाभास है। बाहर बोर्ड पर गर्व से "इंडियन रेस्टोरेंट" लिखा होता है, लेकिन किचन से लेकर गल्ले तक की कमान असल में बांग्लादेशी और पाकिस्तानी मूल के प्रवासियों के हाथों में होती है। आंकड़ों की हकीकत यह है कि ब्रिटेन के करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय रेस्टोरेंट का संचालन बांग्लादेशी, खासतौर पर सिलहट क्षेत्र से आए उद्यमी करते हैं, जबकि एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तानियों के नियंत्रण में है। यह कोई अनजाने में हुआ संयोग नहीं, बल्कि दशकों से चला आ रहा एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति और ब्रांडिंग का खेल है। इस मुखौटे की सबसे बड़ी वजह "इंडिया" नाम की ऐतिहासिक और वैश्विक ब्रांड वैल्यू है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर से ही अंग्रेजों के दिमाग में मसालों, समृद्ध संस्कृति और खान-पान की पहचान सीधे भारत से जुड़ी हुई थी। ब्रिटेन के आम ग्राहकों के लिए "इंडियन करी" एक जाना-पहचाना, भरोसेमंद और सकारात्मक स्वाद का प्रतीक बन चुका था। इसके विपरीत, 1947 के बंटव...

30 अगस्त 1659 को औरंगजेब के आदेश पर उसके सगे बड़े भाई दारा शिकोह की निर्ममता से हत्या

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 30 अगस्त 1659 को मुगल इतिहास की एक बेहद क्रूर और निर्णायक घटना घटी जब औरंगजेब के आदेश पर उसके सगे बड़े भाई दारा शिकोह की निर्ममता से हत्या कर दी गई। शाहजहां के बीमार पड़ते ही चारों भाइयों के बीच गद्दी के लिए भीषण गृहयुद्ध छिड़ गया था। दारा शिकोह शाहजहां के सबसे बड़े और पसंदीदा बेटे थे जिन्हें आधिकारिक तौर पर उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। वह स्वभाव से बेहद उदार, दार्शनिक और सूफी विचारधारा के समर्थक थे। उन्होंने हिंदू और इस्लाम धर्म की समानताओं को उजागर करने के लिए उपनिषदों और भगवद गीता का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया था, जिसे सिर्र-ए-अकबर यानी महान रहस्य नाम दिया गया। औरंगजेब एक कट्टर रूढ़िवादी और महत्वाकांक्षी शासक था, जो दारा शिकोह की इस उदारवादी धार्मिक नीति को इस्लाम के खिलाफ मानता था। औरंगजेब ने दारा शिकोह की हत्या केवल सत्ता हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि राजनैतिक और धार्मिक वर्चस्व को पूरी तरह स्थापित करने के लिए करवाई थी। औरंगजेब ने सामूगढ़ और देवराई के युद्धों में दारा शिकोह की सेना को बुरी तरह हरा दिया था। इसके बाद दारा शिकोह को बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया, जहां औरंगजेब न...

30 अगस्त 1574 को गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु बने थे

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  30 अगस्त 1574 को गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु बने थे, जिन्हें यह गुरुगद्दी अपने ससुर और तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी से प्राप्त हुई थी। सिख इतिहास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उन्होंने ही पवित्र शहर अमृतसर की स्थापना की थी, जिसे शुरुआती समय में 'रामदासपुर' के नाम से जाना जाता था। इसके साथ ही उन्होंने अमृतसर में पवित्र संतोखसर सरोवर की खुदाई का कार्य भी शुरू करवाया था। धार्मिक और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में उन्होंने सिख विवाह समारोह यानी आनंद कारज के दौरान पढ़ी जाने वाली चार 'लवाण' (फेरों के सूक्त) की रचना की थी, जिसका पालन आज भी सिख परंपराओं में पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है। #गुरुरामदास_जी #अमृतसर #रामदासपुर #इतिहास #GuruRamdasJi #Amritsar #Ramdaspur #History #Fact #HindiFact #factsinhindi #factsdaily #historyfacts #historyofindia

महान स्वतंत्रता सेनानी कनाईलाल दत्त

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  भारत माँ के वीर सपूत और महान स्वतंत्रता सेनानी कनाईलाल दत्त का जन्म 30 अगस्त 1888 को बंगाल के हुगली जिले के चंदननगर में हुआ था। वह देश की आजादी के लिए मात्र 20 वर्ष की आयु में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। अपने छात्र जीवन के दौरान ही वह बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन 'अनुशीलन समिति' और 'युगांतर' समूह के सक्रिय सदस्य बन गए थे, जहाँ उन्होंने 1905 में हुए बंगाल विभाजन का कड़ा विरोध किया था। साल 1908 में मुजफ्फरपुर के दमनकारी अंग्रेज मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड पर हुए हमले के बाद ब्रिटिश सरकार ने कड़ी कार्रवाई की। इस अलीपुर बम कांड के सिलसिले में कनाईलाल दत्त, अरविन्द घोष और बारीन्द्र कुमार घोष सहित कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर अलीपुर जेल में डाल दिया गया। इसी दौरान जेल में बंद क्रांतिकारियों में से एक, नरेन्द्र नाथ गोस्वामी (नरेन), अंग्रेजों का सरकारी मुखबिर बन गया और उसने दल के कई गुप्त राज अंग्रेजों के सामने उगल दिए। क्रांतिकारी आंदोलन और अपने साथियों को सुरक्षित रखने के लिए कनाईलाल दत्त और सत्येन्द्रनाथ बोस ने जेल के भीतर ही एक साहसिक योजना बनाई। उन्होंन...

Gen Z लड़की से क्यों डर गया राहुल गांधी ?

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 राहुल गांधी और उनकी करोड़ों रुपयों वाली पीआर मशीनरी को महज़ 20 साल की एक जेन-ज़ी लड़की ने पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है। इसी घबराहट का नतीजा है कि कांग्रेस ने इस युवा फैक्ट चेकर के खिलाफ बाकायदा एफआईआर दर्ज करवा दी। असल विवाद तब शुरू हुआ जब राहुल गांधी ने प्रयागराज, कोटा, देहरादून और पुणे इन चार शहरों में अपने कार्यक्रमों के दौरान ताबड़तोड़ 40 ऐसे दावे कर दिए, जो पूरी तरह से फर्जी और भ्रामक साबित हुए। एक 20 साल की Gen Z लड़की से क्यों डर गया राहुल गांधी ?  Gen Z फैक्ट चेकर पर कांग्रेस ने करवाई FIR, इसने राहुल गांधी की करोड़ो रूपयों वाली पूरी PR मशीनरी का गेम बिगाड़ दिया है। कांग्रेस के इन भ्रामक दावों की हकीकत जनता के सामने लाने के लिए उस 20 साल की लड़की ने 'झूठ की गूँज' नाम से एक वेबसाइट तैयार की। इस एक वेबसाइट ने राहुल गांधी के हर झूठे दावे का तथ्यात्मक विश्लेषण करके उनकी भारी-भरकम पीआर टीम और कांग्रेस आईटी सेल की कथित झूठ की फैक्ट्री का पूरा गेम बिगाड़ दिया। सिर्फ एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के दम पर जब पूरे राजनीतिक तंत्र के दावों की पोल खुली, तो कांग्रेस के पास जवाब देने क...

बाबा हरभजन सिंह की आत्मा देश की सीमाओं की रक्षा कर रही है।

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  भारतीय सेना के वीर सैनिक बाबा हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को पंजाब के गुजरावाला जिले के सदराना गांव में हुआ था, जो वर्तमान समय में पाकिस्तान का हिस्सा है। वे महज 19 वर्ष की आयु में 12 फरवरी 1966 को भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में बतौर सिपाही शामिल हुए थे। पूर्वी सिक्किम के नाथू ला पास के पास सेना में अपनी सेवा देते हुए 4 अक्टूबर 1968 को एक दर्दनाक हादसे में उनकी शहादत हुई। खच्चरों का काफिला ले जाने के दौरान पैर फिसलने की वजह से वे एक गहरे नाले में गिर गए थे। उनकी मृत्यु के बाद से जुड़ी एक अद्भुत मान्यता है कि वे अपने एक साथी सैनिक के सपने में आए और उन्होंने अपने पार्थिव शरीर की सटीक लोकेशन बताई, जिसके बाद सेना ने उनके शव को उसी स्थान से बरामद किया। सैनिकों और स्थानीय लोगों के बीच यह दृढ़ विश्वास है कि शहीद होने के बाद भी बाबा हरभजन सिंह की आत्मा देश की सीमाओं की रक्षा कर रही है। ऐसा माना जाता है कि वे चीनी सेना की किसी भी संदिग्ध गतिविधि के बारे में भारतीय सैनिकों को सपने में आकर पहले ही सचेत कर देते हैं। उनके प्रति सम्मान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत और ची...

भविष्य पुराण को अशुद्ध और विकृत करने का ब्रिटिश षड्यंत्र

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  भविष्य पुराण को अशुद्ध और विकृत करने का ब्रिटिश षड्यंत्र 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल और ईसाई मिशनरियों के गठजोड़ द्वारा रचा गया था। इस पूरी जालसाजी की शुरुआत सन 1800 के बाद तब हुई, जब अंग्रेजों ने महसूस किया कि तलवार के बल पर भारतीयों का धर्मांतरण करना असंभव है, इसलिए उन्होंने भारत के प्राचीन धार्मिक वांग्मय को ही भीतर से खोखला करने की नीति अपनाई। भविष्य पुराण अपनी प्रकृति के कारण इस षड्यंत्र के लिए सबसे आसान लक्ष्य बना, क्योंकि इसमें इतिहास को भविष्य की वंशावलियों के रूप में लिखने की एक पारंपरिक शैली पहले से मौजूद थी। इस औपनिवेशिक साजिश को अंजाम देने के लिए अंग्रेजों ने संस्कृत के कुछ स्थानीय लालची, हिन्दू विरोधी और वामपंथ से प्रेरित लोगों को आर्थिक संरक्षण दिया और उनसे भारी मात्रा में नए श्लोक लिखवाए। इन जाली श्लोकों को भविष्य पुराण के 'प्रतिसर्ग पर्व' में शामिल किया गया, जिसका प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों में कोई वजूद नहीं था। इस मिलावट का मुख्य रणनीतिक उद्देश्य यह था कि जब कोई साधारण हिंदू अपने ग्रंथों को पढ़े, तो उसे लगे कि ईसा मसीह (ईशपुत्र) य...

चाय को लेकर राहुल गांधी का हालिया बयान उनकी जमीनी हकीकत

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  राहुल गांधी का हालिया बयान उनकी जमीनी हकीकत से कटी हुई सोच और समाज में विभाजन पैदा करने की सियासत का एक और प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर सामने आया है। उन्होंने देश भर की चाय की दुकानों को लेकर एक ऐसा अजीबोगरीब और बेतुका दावा पेश किया, जिसे सुनकर कोई भी आम नागरिक हैरान रह जाएगा। राहुल गांधी के अनुसार देश की चाय की थड़ियों पर दो तरह के ग्लास होते हैं एक कांच का रीयूजेबल ग्लास और दूसरा इस्तेमाल करके फेंक देने वाला डिस्पोजेबल ग्लास। उनके इस बेतुके तर्क के मुताबिक, सवर्ण समाज के लोग कांच के गिलासों में चाय पीते हैं, जबकि दलितों और अन्य जातियों के लोगों को डिस्पोजेबल गिलासों में चाय दी जाती है। यह बयान उनकी घोर अज्ञानता और जमीनी वास्तविकताओं से पूरी तरह अनभिज्ञ होने का जीता-जागता सबूत है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने कभी आम जनता के बीच बैठकर किसी सामान्य चाय की दुकान पर चाय पीने का अनुभव ही नहीं किया है, फिर भी हर सामान्य और रोजमर्रा की चीज में जबरन जातिवाद घुसाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। असल में हिंदू समाज को बांटने और वर्ग-विभाजन का झूठा नैरेटिव खड़ा करने का एक तय एजेंडा चलाया जा रहा है,...

डायरेक्ट एक्शन डे 16 अगस्त 1947 Direct Action Day

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 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा घोषित डायरेक्ट एक्शन डे भारतीय इतिहास का एक अत्यंत काला अध्याय है, जिसका सबसे दर्दनाक और भयावह खामियाजा कोलकाता के बहुसंख्यक हिंदू समाज को भुगतना पड़ा। डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान हिंदुओं को जिस अमानवीय और दर्दनाक स्थिति का सामना करना पड़ा, उसकी पूरी विस्तृत और क्रूर सच्चाई इस प्रकार है। 16 अगस्त 1946 की सुबह कोलकाता के हिंदुओं के लिए एक ऐसा खौफनाक मंजर लेकर आई जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने सुबह से ही जबरन दुकानें बंद करवाना शुरू कर दिया और विरोध करने वाले हिंदू दुकानदारों पर लाठियों, छुरों और पेट्रोल बमों से हमले शुरू कर दिए। उस समय बंगाल के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने न केवल पुलिस को थानों में बंद रहने का गुप्त आदेश दिया, बल्कि लालबाजार पुलिस मुख्यालय के कंट्रोल रूम में खुद बैठकर स्थिति को नियंत्रित करने के बजाय दंगाइयों को संरक्षण दिया। दोपहर में जब शहीद मीनार मैदान पर लाखों की हिंसक भीड़ जमा हुई, तो सुहरावर्दी ने मंच से खुलेआम कहा कि पुलिस और सेना उनके काम में दखल नहीं देगी। इस उकसावे के बाद हथियारों...

लोकतांत्रिक पदों पर लगातार 25 वर्ष रहने और इस दौरान हर साल 15 अगस्त को ध्वजारोहण करने करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी

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 लोकतांत्रिक पदों पर लगातार 25 वर्ष रहने और इस दौरान हर साल 15 अगस्त को ध्वजारोहण करने का एक ऐसा अनोखा रिकॉर्ड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनाया है जो देश का कोई और प्रधानमंत्री नहीं बना सका। आज 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से लगातार 13वीं बार तिरंगा फहराकर उन्होंने इतिहास रचा है। इस गौरवशाली पल के पीछे उनका एक अनूठा लोकतांत्रिक सफर छिपा है क्योंकि वे देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो लगातार 25 वर्षों से शीर्ष लोकतांत्रिक पदों पर बने हुए हैं। इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत अक्टूबर 2001 में हुई जब उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला। मई 2014 तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने लगातार 12 बार राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोहों में तिरंगा फहराया। इसके बाद मई 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने से लेकर आज तक उन्होंने लगातार 13वीं बार देश के मुख्य मंच से ध्वजारोहण कर राष्ट्र को संबोधित किया है।यह रिकॉर्ड इसलिए सबसे अलग है क्योंकि भारत के इतिहास में जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या मनमोहन सिंह जैसे नेता कभी मुख्यमंत्री नहीं रहे और सीधे प्रधानमंत्री बने। जबकि प्रथम बार जवाहर लाल ने...

15 अगस्त 1947 को इंडिया गेट पर तिरंगा फहराया मनोनीत प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा

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  15 अगस्त 1947 को नई दिल्ली में इंडिया गेट के पास स्थित प्रिंसेस पार्क में पहली बार आधिकारिक सार्वजनिक समारोह में तिरंगा झंडा फहराया गया था और इस ऐतिहासिक ध्वजारोहण को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ही संपन्न किया था। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि लाल किले की प्राचीर पर पहली बार तिरंगा इसके अगले दिन यानी 16 अगस्त 1947 को फहराया गया था। जवाहरलाल नेहरू को मनोनीत प्रधानमंत्री इसलिए कहा जाता है क्योंकि देश की आजादी के समय तुरंत आम चुनाव कराना संभव नहीं था। वर्ष 1946 में भारत की अंतरिम सरकार के गठन और कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान लोकतांत्रिक बहुमत पूरी तरह से सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में था। उस समय कुल 15 प्रांतीय कांग्रेस समितियों में से 12 समितियों ने सर्वसम्मति से सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव अध्यक्ष पद के लिए भेजा था, जबकि शेष 3 समितियों ने किसी भी नाम का प्रस्ताव नहीं किया था। ब्रिटिश सरकार की योजना के अनुसार जो व्यक्ति कांग्रेस का अध्यक्ष बनता, उसे ही अंतरिम सरकार का मुखिया और आगे चलकर देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया जाना तय था। इसके बावजूद, देश की एक भी प्रांतीय समिति ने ...

मानसून सत्र का हंगामे की भेंट चढ़ना

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 मानसून सत्र का हंगामे की भेंट चढ़ना और लोकसभा की उत्पादकता का गिरकर महज 15 प्रतिशत पर आ जाना भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे निराशाजनक अध्यायों में से एक है। पिछले 22 वर्षों में यह अब तक का सबसे निचला स्तर है, जो सीधे तौर पर इस बात को उजागर करता है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत को किस तरह राजनीतिक खींचतान का अखाड़ा बना दिया गया। संसद के संचालन पर प्रतिदिन लगभग 9 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जो सीधे तौर पर जनता के पसीने की कमाई और टैक्स का पैसा है। सत्र के दौरान लगातार वेल में आकर नारेबाजी करना, तख्तियां दिखाना और कार्यवाही को बार-बार स्थगित कराने की रणनीति ने इस भारी-भरकम बजट और अनमोल विधायी समय को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। इस पूरे गतिरोध में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और उसके शीर्ष नेता राहुल गांधी, साथ ही समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव जैसे विपक्षी चेहरों की भूमिका पर सीधे तौर पर सवाल उठते हैं। जनता ने इन नेताओं और सांसदों को चुनकर इसलिए भेजा था ताकि वे देश की बुनियादी समस्याओं, विकास योजनाओं और जनकल्याणकारी नीतियों पर नियम और कानून बनाने में अपनी भागीदारी निभाएं। लेकिन नीतिगत बहस...

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा Vs कामकोटि

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 संसद के पवित्र सदन में जब ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए थी, तब जनसेवा के नाम पर राजनीति का ककहरा सीख रही कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपनी अद्भुत और असीमित बौद्धिक क्षमता का परिचय दे डाला। एंटी-पेपर लीक बिल जैसे गंभीर मुद्दे पर ठोस बात करने के बजाय उन्होंने आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि पर तंज कसते हुए उन्हें 'गोमूत्र-एक्सपर्ट' की उपाधि दे डाली। यह वही तथाकथित 'गोमूत्र विशेषज्ञ' हैं जो कंप्यूटर आर्किटेक्चर, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी और देश के पहले स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर 'शक्ति' के जनक हैं, लेकिन शायद चुनावी रैलियों में ताली बटोरने वाली राजनीति के लिए विज्ञान की यह भाषा बेहद जटिल थी। प्रियंका गांधी ने बड़े गर्व से सवाल उछाला था कि आखिर इस 'एक्सपर्ट' को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा, मानो देश की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान को चलाने वाले वैज्ञानिक से ज्यादा शिक्षा की समझ सिर्फ परिवारवाद की छत्रछाया में पलने वाले नेताओं को ही होती है। जिस प्रोफेसर कामकोटि के एक पुराने वीडियो में 'नेचर' जैसे विश्व प्रसिद्ध जर्नल के वैज्ञानिक त...

पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए

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 पाकिस्तान के हुक्मरानों की बयानबाजी भी किसी अजब-गजब नाटक से कम नहीं लगती। जिस मुल्क की पूरी राजनीति और अस्तित्व ही भारत-विरोध की जमीन पर टिका हो, उसके वजीर-ए-आजम अपनी खोखली धमकियों को वजनदार बनाने के लिए भारतीय संस्कृति के महाकाव्य रामायण से उधार ली गई लक्ष्मण रेखा का मुहावरा इस्तेमाल कर रहे हैं। पानी की हर एक बूंद को अपनी संप्रभुता बताने वाले यह भूल जाते हैं कि जिस पानी पर वे अपनी जागीर का दावा ठोक रहे हैं, वह दशकों से सिंधु जल समझौते के तहत भारत के संयम और सद्भाव की बदौलत ही उनकी तरफ बह रहा है। अपनी जनता को बुनियादी जरूरतें देने में नाकाम हुकूमत जब भारत को अक्ल सिखाने और सीधा जवाब देने की गर्जना करती है, तो दुनिया डरने के बजाय केवल ठहाके लगाती है। हकीकत तो यह है कि पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए। कराची की सड़कों पर बूंद-बूंद के लिए टैंकर माफिया आम अवाम को लूट रहा है, सिंध और पंजाब प्रांतों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर आए दिन तलवारें खिंच जाती हैं, और बलूचिस्तान के लोग एक घूंट साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। दशकों से जो मुल्क अ...

1983 के गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो से गले मिलते हुए

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 कूटनीति और सार्वजनिक विमर्श के दोहरे मापदंडों पर यदि कभी खुली चर्चा हो, तो वर्तमान राजनीति के कुछ चेहरे पूरी तरह बेनकाब नजर आते हैं। जब इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए, तो 1983 के गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो के बीच हुए उस बहुचर्चित गले मिलने को कांग्रेस दशकों तक अपनी कूटनीतिक जीत और वैश्विक प्रभाव के रूप में प्रस्तुत करती रही है। उस समय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों और आत्मीयता को विदेश नीति की परिपक्वता बताया गया था। लेकिन आज जब वही राजनीतिक विरासत संभालने वाले नेता राहुल गांधी मंचों से अंतरराष्ट्रीय स्तर की महिला नेताओं और राजनयिक शिष्टाचार पर स्तरहीन टिप्पणियां करते हैं, तो उनकी समझ और कथनी-करनी का खोखलापन साफ दिखाई देने लगता है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर सार्वजनिक मंचों से जिस तरह की हल्की, फूहड़ और अशोभनीय बयानबाजी की गई, उसने राजनीतिक विमर्श के स्तर को बेहद नीचे गिरा दिया है। सवाल यह उठता है कि यदि ठीक उसी तरह की द्विअर्थी और भद्दी टिप्पणियां कभी हवाना में इं...

14 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान एक पृथक् और नया राष्ट्र बना

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 14 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान एक पृथक् और नया राष्ट्र बना, जबकि इसके अगले ही दिन 15 अगस्त 1947 को भारत को आधिकारिक तौर पर अपनी स्वतंत्रता मिली। इस ऐतिहासिक और दर्दनाक बंटवारे के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा का निर्धारण करने के लिए सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में रेडक्लिफ रेखा खींची गई, जिसने मुख्य रूप से पंजाब और बंगाल प्रांतों को दो हिस्सों में बांट दिया था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन हुआ, जिसमें करोड़ों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सीमा के पार जाना पड़ा और इस दौरान भड़की भारी हिंसा में लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस दर्दनाक त्रासदी, विस्थापन के दर्द और पीड़ितों के बलिदान को याद करते हुए भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के रूप में मनाया जाता है। #विभाजन_विभीषिका_दिवस #भारत #हिन्दू #विभाजन

15 अगस्त 1947 को आजादी मिली लेकिन लाखों लोगों तो पता ही नहीं था कि वह भारत में है या पाकिस्तान में

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 14 अगस्त की वह काली आधी रात जिसे इतिहास की किताबों में आजादी का जश्न बताया गया, वास्तव में लाखों मासूमों की नियति के साथ खेला गया इतिहास का सबसे खौफनाक और घिनौना मजाक था। जब राजधानी के सत्ता के गलियारों में आजादी के तराने गाए जा रहे थे, ठीक उसी वक्त सरहदों पर बसी करोड़ों की आबादी इस मुगालते में जी रही थी कि अगली सुबह उनका वजूद किस मुल्क का हिस्सा होगा। ब्रिटिश हुकूमत के प्यादे सिरिल रेडक्लिफ ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर महज पांच हफ्तों के भीतर एक प्राचीन सभ्यता के सीने पर नक्शों और स्याही की ऐसी खूनी लकीर खींच दी, जिसने सदियों पुराने रिश्तों, आस्थाओं और जिंदगियों को बेरहमी से काट कर रख दिया। सबसे बड़ा षड्यंत्र तो यह था कि विभाजन की यह रिपोर्ट 12 अगस्त को ही मुकम्मल हो चुकी थी, मगर सत्ता के ठेकेदारों ने दंगों और बगावत के खौफ से इसे 17 अगस्त तक एक गहरी तिजोरी में दबाए रखा। आजादी के दिन किसी आम इंसान को यह खबर तक नहीं थी कि उसका अपना घर किस देश की जमीन पर खड़ा है, और उस दौर के सबसे बड़े नेता मोहनदास करमचंद गांधी भी इस भयावह धोखे पर पूरी तरह खामोश रहे। इस आपराधिक गोपनीयता ने जमीन पर...

14 अगस्त 1947 मुख्य ध्वजस्तंभ से ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीक 'यूनियन जैक' को आधिकारिक रूप से नीचे उतारा गया था।

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 14 अगस्त 1947 की शाम भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और भावुक क्षणों में से एक थी। इसी दिन नई दिल्ली स्थित वायसराय हाउस (जिसे अब राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता है) के मुख्य ध्वजस्तंभ से ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीक 'यूनियन जैक' को आधिकारिक रूप से नीचे उतारा गया था। यह केवल एक कपड़े के टुकड़े को उतारना नहीं था, बल्कि भारत की भूमि पर पिछले लगभग दो सौ वर्षों से चले आ रहे औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन और उसकी संप्रभुता के अंत की एक औपचारिक और वैश्विक घोषणा थी। इस ऐतिहासिक घटना को देखने और इतिहास को बदलते हुए महसूस करने के लिए वहां बड़ी संख्या में लोग और गणमान्य नागरिक मौजूद थे, जो सदियों की गुलामी के बाद आजादी की नई सुबह का इंतजार कर रहे थे। इसके तुरंत बाद 14 और 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को नई दिल्ली के काउंसिल हाउस (अब पुराना संसद भवन) के केंद्रीय कक्ष में संविधान सभा का एक विशेष और ऐतिहासिक सत्र आयोजित किया गया। रात के ठीक बारह बजते ही जब पूरी दुनिया सो रही थी, तब भारत ने जीवन और स्वतंत्रता में कदम रखा और देश की सत्ता पूरी तरह से भारतीय नेताओं के हाथों में सौंप दी गई। इसी सत्र में द...

जब कांग्रेस के नेता विदेशी तानाशाहों और नेताओं से गले मिलते थे, तो वह विश्व बंधुत्व और महान विदेश नीति कहलाती थी

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 जब हिसाब बराबर करने की नौबत आएगी तो राहुल गांधी और उनकी पूरी चमचों की जमात को मुंह छुपाने की जगह नहीं मिलेगी। जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक नेताओं के साथ गर्मजोशी, कूटनीतिक पकड़ या प्रोटोकॉल तोड़कर मिलने वाली तस्वीरों पर तंज कसा जाता है, तब असल में कांग्रेस अपने ही खोदे गड्ढे में गिरती है। दूसरों की विदेश नीति पर उंगली उठाने से पहले राहुल गांधी को अपने खानदान और अपनी पार्टी के काले पन्नों को पलटकर देखना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जब बात कूटनीति और मुलाक़ातों की निकलेगी, तो हर पुरानी फाइल की धूल हटेगी और कांग्रेस का दोहरा चरित्र पूरी दुनिया के सामने बेनकाब होगा। इस हिसाब-किताब में सबसे पहला नाम देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का आएगा। वही नेहरू जो 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के खोखले नारों के बीच चाऊ एन लाई के गले लग रहे थे। नेहरू की उसी तथाकथित कूटनीतिक झप्पी और आंख मूंदकर किए गए भरोसे की कीमत इस देश ने 1962 में अपनी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन गंवाकर और हमारे वीर जवानों की शहादत देकर चुकाई थी। चाऊ एन लाई के साथ नेहरू की वे तस्वीरें सिर्फ मुलाकातें नहीं थीं, बल...

विभाजन विभीषिका दिवस 14 अगस्त 1947

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  भारतीय विभाजन आधुनिक विश्व इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक है। इसकी शुरुआत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की 'फूट डालो और राज करो' की नीति, मुस्लिम लीग की द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की मांग और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण हुई थी। मार्च 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का आखिरी वायसराय बनाकर भेजा गया, जिनका मुख्य कार्य ब्रिटिश शासन की विदाई को सुचारू बनाना था। शुरुआती योजना के अनुसार भारत को जून 1948 में आजाद किया जाना था, लेकिन देश में बढ़ते भीषण सांप्रदायिक दंगों और राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए माउंटबेटन ने इस प्रक्रिया को करीब दस महीने पहले ही पूरा करने का फैसला किया। 3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना की घोषणा की गई, जिसने आधिकारिक तौर पर भारत और पाकिस्तान के रूप में दो अलग देशों के निर्माण पर मुहर लगा दी। भौगोलिक सीमाओं को तय करने का काम ब्रिटिश वकील सिरिल रेडक्लिफ को सौंपा गया, जिन्हें भारतीय भूगोल, जनसांख्यिकी या संस्कृति का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। रेडक्लिफ सीमा आयोग को पंजाब और बंगाल जैसे विशाल राज्यों को हिंदू और मुस्लिम बहुल आबादी के आधार पर विभाजित करने का ...

15 अगस्त को आज़ादी तो मिल गई, लेकिन लाखों लोगों को यह पता ही नहीं था कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में।

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  14 अगस्त की वह काली आधी रात जिसे इतिहास की किताबों में आजादी का जश्न बताया गया, वास्तव में लाखों मासूमों की नियति के साथ खेला गया इतिहास का सबसे खौफनाक और घिनौना मजाक था। जब राजधानी के सत्ता के गलियारों में आजादी के तराने गाए जा रहे थे, ठीक उसी वक्त सरहदों पर बसी करोड़ों की आबादी इस मुगालते में जी रही थी कि अगली सुबह उनका वजूद किस मुल्क का हिस्सा होगा। ब्रिटिश हुकूमत के प्यादे सिरिल रेडक्लिफ ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर महज पांच हफ्तों के भीतर एक प्राचीन सभ्यता के सीने पर नक्शों और स्याही की ऐसी खूनी लकीर खींच दी, जिसने सदियों पुराने रिश्तों, आस्थाओं और जिंदगियों को बेरहमी से काट कर रख दिया। सबसे बड़ा षड्यंत्र तो यह था कि विभाजन की यह रिपोर्ट 12 अगस्त को ही मुकम्मल हो चुकी थी, मगर सत्ता के ठेकेदारों ने दंगों और बगावत के खौफ से इसे 17 अगस्त तक एक गहरी तिजोरी में दबाए रखा। आजादी के दिन किसी आम इंसान को यह खबर तक नहीं थी कि उसका अपना घर किस देश की जमीन पर खड़ा है, और उस दौर के सबसे बड़े नेता मोहनदास करमचंद गांधी भी इस भयावह धोखे पर पूरी तरह खामोश रहे। इस आपराधिक गोपनीयता ने जमीन प...

13 अगस्त 1947 को हैदराबाद के अंतिम निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने ब्रिटिश भारत की समाप्ति पर एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने राज्य को न तो भारत और न ही पाकिस्तान में शामिल करने की घोषणा की

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  13 अगस्त 1947 को हैदराबाद के अंतिम निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने ब्रिटिश भारत की समाप्ति पर एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने राज्य को न तो भारत और न ही पाकिस्तान में शामिल करने की घोषणा की, बल्कि इसे एक स्वतंत्र संप्रभु रियासत बनाए रखने का इरादा जताया। हैदराबाद उस समय क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी और समृद्ध रियासतों में से एक थी। निज़ाम के पास अपनी खुद की सेना, रेलवे नेटवर्क, डाक विभाग और मुद्रा थी। इस आर्थिक और सैन्य आत्मनिर्भरता के बल पर वे हैदराबाद को एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थापित करना चाहते थे, भले ही उनका राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था। भारत सरकार और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल हैदराबाद को भारत संघ का हिस्सा बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। भौगोलिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत के ठीक बीच में एक स्वतंत्र विदेशी राज्य का होना देश की अखंडता के लिए बड़ा खतरा था। नवंबर 1947 में दोनों पक्षों के बीच एक वर्ष के लिए यथास्थिति समझौता भी हुआ, ताकि बातचीत से कोई शांतिपूर्ण रास्ता निकाला जा सके। इस दौरान हैदराबाद के भीतर हालात बिगड़ने ल...

13 अगस्त 1891 को मणिपुर की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले महान नायक युवराज बीर टिकेंद्रजीत सिंह और उनके वफादार जनरल थंगल को ब्रिटिश हुकूमत ने इम्फाल के पोलो ग्राउंड में हजारों लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी थी।

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  13 अगस्त 1891 का दिन भारतीय इतिहास और विशेष रूप से मणिपुर के गौरवशाली इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावुक कर देने वाला अध्याय है। इस दिन मणिपुर की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा के लिए लड़ने वाले महान नायक युवराज बीर टिकेंद्रजीत सिंह और उनके वफादार जनरल थंगल को ब्रिटिश हुकूमत ने इम्फाल के पोलो ग्राउंड (जिसे अब बीर टिकेंद्रजीत पार्क कहा जाता है) में हजारों लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी थी। इन दोनों वीर योद्धाओं ने ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों के सामने घुटने टेकने के बजाय मातृभूमि की संप्रभुता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। मणिपुर के लोग हर साल 13 अगस्त को इन महान सपूतों और आंग्ल-मणिपुर युद्ध के सभी अज्ञात शहीदों के बलिदान को याद करते हुए 'देशभक्त दिवस' (Patriots' Day) के रूप में मनाते हैं। इस ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि 1891 के आंग्ल-मणिपुर युद्ध से जुड़ी है। उस समय मणिपुर के शाही परिवार में आंतरिक मतभेद चल रहे थे, जिसका फायदा उठाकर ब्रिटिश सरकार ने राज्य के मामलों में सीधा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था। राजकुमार बीर टिकेंद्रजीत, जो मणिपुर सेना के कमांडर...

13 अगस्त 1947 को त्रिपुरा की महारानी कंचनप्रभा देवी ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए विलय के समझौते (Instrument of Accession) पर ऐतिहासिक हस्ताक्षर किए थे

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 13 अगस्त 1947 को त्रिपुरा की महारानी कंचनप्रभा देवी ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए विलय के समझौते (Instrument of Accession) पर ऐतिहासिक हस्ताक्षर किए थे, जो भारत की स्वतंत्रता से ठीक दो दिन पहले का एक बड़ा फैसला था। इस पूरी घटनाक्रम के पीछे एक गहरा ऐतिहासिक संकट था, क्योंकि त्रिपुरा के अंतिम शासक महाराजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य का भारत की आजादी से कुछ महीने पहले, 17 मई 1947 को अचानक असमय निधन हो गया था। उनके निधन के बाद उनके बेटे किरीट बिक्रम किशोर माणिक्य गद्दी पर बैठे, लेकिन उस समय उनकी उम्र महज 13 वर्ष थी और वे एक नाबालिग थे। इस प्रशासनिक शून्य को भरने के लिए महारानी कंचनप्रभा देवी की अध्यक्षता में एक काउंसिल ऑफ रीजेंसी (संरक्षक परिषद) का गठन किया गया, जिसकी कमान संभालते हुए उन्होंने राज्य के शासन और सुरक्षा के फैसले लेने शुरू किए। भारत के विभाजन के उस दौर में त्रिपुरा चौतरफा संकटों से घिर गया था, क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की भौगोलिक निकटता के कारण राज्य पर आंतरिक और बाहरी ताकतों का भारी दबाव था और विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे भी हो रहे थे...

भारत का पहला स्वदेशी दो-सीटर विमान 'हिंदुस्तान ट्रेनर-2'

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  13 अगस्त 1951 को Hindustan Aircraft Limited (एचएएल) द्वारा पूरी तरह भारत में डिजाइन और निर्मित पहले स्वदेशी दो-सीटर विमान 'हिंदुस्तान ट्रेनर-2' (HT-2) ने बेंगलुरु में अपनी पहली सफल उड़ान भरकर भारतीय विमानन इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल किया था। #फैक्ट #भारत #विमान #Bharat #Fact #historyofindia #History

13 अगस्त 1947 लाहौर में दंगे

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 1947 का विभाजन केवल मानचित्र पर खींची गई सीमाओं का बँटवारा नहीं था, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन, स्मृतियों, घरों और सपनों के तिनका-तिनका होकर बिखर जाने की एक असीम विभीषिका थी। सदियों से फल-फूल रही सभ्यता, साझा संस्कृति और आत्मीय रिश्तों को अचानक एक रेखा खींचकर दो हिस्सों में बाँट दिया गया। इस त्रासद घटना ने उन ऐतिहासिक नगरों को कभी न भरने वाले गहरे घाव दिए, जो भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि के स्तंभ हुआ करते थे। इन्हीं समृद्ध नगरों में शिरोमणि था लाहौर एक ऐसा शहर जो अपनी गतिशीलता, व्यापारिक कुशाग्रता और बहुसांस्कृतिक विरासत के लिए पूरे उपमहाद्वीप में प्रसिद्ध था। विभाजन से पूर्व लाहौर अखंड भारत के सबसे प्रमुख और जीवंत औद्योगिक एवं व्यापारिक केंद्रों में गिना जाता था। 1940 के दशक के औद्योगिक सर्वेक्षणों के आँकड़े इसकी आर्थिक ताकत की गवाही देते हैं। उस समय लाहौर में 250 से अधिक बड़े कारखाने पूरी क्षमता के साथ संचालित हो रहे थे, जो उत्तर भारत की आर्थिक प्रगति को निरंतर गति दे रहे थे। अविभाजित पंजाब के कुल औद्योगिक उत्पादन में अकेले लाहौर की हिस्सेदारी 3 से 4 प्रतिशत...

अभिजीत दीपके द्वारा फैलाए जा रहे झूठ

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  अभिजीत दीपके नाम के इस व्यक्ति के द्वारा फैलाए जा रहे झूठ और षड्यंत्र की परतें एक-एक करके पूरी तरह खुल चुकी हैं। सबसे पहले, जिस स्कॉलरशिप लेटर को इसने अपने यूट्यूब चैनल और मोजो टीवी पर गर्व से दिखाया था, जब उस इमेज को कई एआई इमेज डिटेक्टर्स पर जांचा गया तो सभी डिटेक्टर्स ने उच्च आत्मविश्वास के साथ उसे पूरी तरह एआई जनरेटेड और फर्जी करार दिया। इतना ही नहीं, अभिजीत अय्यर मित्रा द्वारा बोस्टन यूनिवर्सिटी की एलुमनाई लिस्ट खंगालने पर भी इसका कहीं कोई नाम दर्ज नहीं मिला। इसकी अमेरिका में पढ़ाई और मौजूदगी के दावों में भी भारी विरोधाभास हैं। बोस्टन यूनिवर्सिटी के आधिकारिक शेड्यूल के अनुसार फॉल 2024 का सत्र 3 सितंबर को शुरू होकर दिसंबर में समाप्त हुआ था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि 26 सितंबर को यह व्यक्ति मोहाली में पिज्जा ऑर्डर कर रहा था और ज़ोमैटो के कर्मचारियों से ऑनलाइन झगड़ रहा था। अभिजीत दीपके दावा करता है कि अमेरिका जाने के इसके पिताजी ने लोन लिया था और पढ़ाई का खर्च उठाया, परंतु यदि लोन लिया है तो इतने कम समय में भारत और अमेरिका के बीच बार बार उड़ानों का भारी-भरकम किराया कौन दे रह...