कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा Vs कामकोटि


 संसद के पवित्र सदन में जब ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए थी, तब जनसेवा के नाम पर राजनीति का ककहरा सीख रही कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपनी अद्भुत और असीमित बौद्धिक क्षमता का परिचय दे डाला। एंटी-पेपर लीक बिल जैसे गंभीर मुद्दे पर ठोस बात करने के बजाय उन्होंने आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि पर तंज कसते हुए उन्हें 'गोमूत्र-एक्सपर्ट' की उपाधि दे डाली। यह वही तथाकथित 'गोमूत्र विशेषज्ञ' हैं जो कंप्यूटर आर्किटेक्चर, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी और देश के पहले स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर 'शक्ति' के जनक हैं, लेकिन शायद चुनावी रैलियों में ताली बटोरने वाली राजनीति के लिए विज्ञान की यह भाषा बेहद जटिल थी। प्रियंका गांधी ने बड़े गर्व से सवाल उछाला था कि आखिर इस 'एक्सपर्ट' को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा, मानो देश की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान को चलाने वाले वैज्ञानिक से ज्यादा शिक्षा की समझ सिर्फ परिवारवाद की छत्रछाया में पलने वाले नेताओं को ही होती है।

जिस प्रोफेसर कामकोटि के एक पुराने वीडियो में 'नेचर' जैसे विश्व प्रसिद्ध जर्नल के वैज्ञानिक तथ्यों का हवाला दिया गया था, उसे प्रियंका गांधी ने अपनी चुनावी समझ के चश्मे से देखकर एक संकीर्ण राजनीतिक हथियार बना लिया। इस अद्भुत अज्ञानता को आईना दिखाने के लिए अब दुनिया भर का वैज्ञानिक समुदाय उठ खड़ा हुआ है। प्रियंका गांधी की इस सतही टिप्पणी के खिलाफ शुरू हुई ऑनलाइन पिटीशन पर दुनिया के 38 देशों के वैज्ञानिकों सहित 14,000 से अधिक प्रबुद्ध लोगों ने हस्ताक्षर करके उन्हें जमीनी हकीकत का अहसास करा दिया है। इतना ही नहीं, देश के 215 से अधिक मौजूदा और पूर्व कुलपतियों तथा शीर्ष शिक्षाविदों ने भी पत्र लिखकर साफ कर दिया है कि संसद के भीतर बैठकर देश के गौरवशाली वैज्ञानिकों का ऐसा फूहड़ और अशोभनीय मजाक उड़ाना किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है।

यह ऑनलाइन मुहिम अब सीधे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के दरवाजे तक पहुंच चुकी है, जहां मांग की जा रही है कि संसद में बैठकर वैज्ञानिकों का अपमान करने वाली इस अमर्यादित भाषा पर कड़ा संज्ञान लिया जाए। दुनिया भर के वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों का यह साझा गुस्सा साफ तौर पर प्रियंका गांधी को यह समझा रहा है कि देश के सर्वोच्च तकनीकी दिमागों को अपनी तुच्छ राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए निशाना बनाना कितना भारी पड़ सकता है। राजनीति की दुनिया से बाहर भी एक ऐसी दुनिया है जो तथ्यों, विज्ञान और मर्यादा को समझती है, और वहां किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक को नीचा दिखाकर खुद को विद्वान साबित करने की बचकानी कोशिशें सिरे से खारिज कर दी जाती हैं।

--- लोकेश कुशवाहा 


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