भारतीय रिसर्च इकोसिस्टम में चीन की घुसपैठ
वैश्विक शैक्षणिक परिदृश्य और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में अपना दबदबा कायम करने के लिए चीन एक सोची-समझी साजिश के तहत भारतीय रिसर्च इकोसिस्टम में घुसपैठ कर रहा है। सीमा और व्यापार के बाद अब चीन ने भारतीय शोधकर्ताओं और युवा प्राध्यापकों को निशाना बनाना शुरू किया है। भास्कर की एक विशेष पड़ताल में सामने आया है कि चीन एक सुनियोजित साइटेशन कार्टेल संचालित कर रहा है। इस नेटवर्क के जरिए भारतीय शोधकर्ताओं को ई-मेल भेजकर सहयोग का झांसा दिया जाता है और फिर पैसों का प्रलोभन देकर उनसे अपने रिसर्च पेपर्स में चीनी शोधपत्रों के अप्रासंगिक संदर्भ यानी साइटेशन जुड़वाए जाते हैं। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य कृत्रिम रूप से चीनी विश्वविद्यालयों और वहां के शोधकर्ताओं के साइटेशन इंडेक्स को बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल करना है।
इस गुप्त सिंडिकेट की कार्यप्रणाली को उजागर करने के लिए जब भास्कर रिपोर्टर ने खुद को एक रिसर्च कंसल्टेंट के रूप में प्रस्तुत किया और चीन की साइंस एक्सप्लोर नामक एजेंसी से संपर्क साधा, तो बातचीत के लिए बाबरा नाम का एक चीनी एजेंट नियुक्त किया गया। इस एजेंट ने वॉट्सएप के जरिए साइटेशन प्रक्रिया और भुगतान के तौर-तरीके साझा किए। बातचीत के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय शोधकर्ता को केवल अपने रिसर्च पेपर का शीर्षक, सह-लेखक और जर्नल का नाम भेजना होता है, जिसके बदले चीनी एजेंसी उन पेपर्स की सूची देती है जिनका संदर्भ जोड़ना अनिवार्य होता है। एजेंट ने शर्त रखी कि शोधपत्र एससीआई, एससीआईई, एसएससीआई या एएंडएचसीआई जैसे प्रतिष्ठित जर्नल्स में ही प्रकाशित होना चाहिए। इसके एवज में प्रति साइटेशन 80 चीनी युआन यानी लगभग 1,134 रुपये और बातचीत को पूरी तरह गोपनीय रखने पर 100 युआन यानी करीब 1,150 रुपये देने की पेशकश की गई। भुगतान के लिए भारतीय बैंक खातों के साथ-साथ पेटीएम, फोनपे, पेपल और क्रिप्टोकरेंसी जैसे तमाम विकल्प उपलब्ध कराए गए।
यह फर्जीवाड़ा केवल नैतिक पतन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी और गंभीर दुष्प्रभाव भारत के शैक्षणिक स्तर पर पड़ रहे हैं। आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर सोमेश माथुर के अनुसार, यह दोहरा नुकसान पहुंचाने वाली स्थिति है। एक तरफ जहां फर्जी साइटेशन के दम पर चीन अपनी वास्तविक वैज्ञानिक क्षमता से कहीं अधिक मजबूत और प्रभावशाली दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय शोध की विश्वसनीयता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिर रही है। वैश्विक अकादमिक जगत में ऐसी धांधली पकड़े जाने पर संबंधित भारतीय शोधकर्ताओं और संस्थानों को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किए जाने का खतरा मंडरा रहा है।
आंकड़ों का विश्लेषण इस खतरे की भयावहता को साफ दर्शाता है। पिछले दस वर्षों में भारतीय शोध में चीनी घुसपैठ में पांच गुना की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2015 में भारत से प्रकाशित कुल 1,68,900 शोधपत्रों में से केवल 3,379 पेपर्स में संदिग्ध चीनी साइटेशन थे, जो कुल संख्या का मात्र दो प्रतिशत था। वर्ष 2021 तक यह आंकड़ा सीमित रहा, लेकिन इसके बाद इसमें अप्रत्याशित उछाल देखा गया। वर्ष 2025 में प्रकाशित कुल 4,97,600 पेपर्स में से 49,760 शोधपत्रों में फर्जी चीनी संदर्भ पाए गए, यानी आज भारत के लगभग दस प्रतिशत शोधपत्र इस चीनी कार्टेल के प्रभाव में आ चुके हैं। कुछ पैसों के लालच में की जा रही यह हेराफेरी भारत की अकादमिक अखंडता और रिसर्च सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट बन चुकी है।
-- लोकेश कुशवाहा
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