दो अलग-अलग घटनाएं कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का जीवंत नमूना
सियासत के रंगमंच पर पाखंड और सुविधा की राजनीति का गजब दौर चल रहा है, जहां दो अलग-अलग घटनाएं कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का जीवंत नमूना पेश करती हैं।
पहला प्रहसन सोनिया गांधी की कथित आत्मकथा 'बिलांगिंग- अ जर्नी ऑफ लव' को लेकर सजाया जा रहा है। किस्सा यह है कि प्रकाशक संस्था पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया इसे भारत में छापने से पीछे हट गई, क्योंकि संपादक को कुछ अंशों पर आपत्ति थी और वे संदर्भ या प्रमाण मांग रहे थे। जब न तो स्रोत मिले और न ही सोनिया जी ने विवादित हिस्से हटाने की सहमति दी, तो प्रकाशक ने अपने कारोबारी नियम के तहत हाथ खींच लिए। किसी भी लेखक और संपादक के बीच तथ्य-पुष्टि की यह निहायत ही सामान्य पेशेवर प्रक्रिया होती है। हालांकि किसी भी पक्ष ने आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है और यह भी मुमकिन है कि पूरा ड्रामा केवल किताब को मुफ्त की पब्लिसिटी दिलाने का सस्ता स्टंट हो। मगर राहुल गांधी के दरबारी बौद्धिकों ने तुरंत राग अलाप दिया कि पेंग्विन यह सब मोदी सरकार के खौफ की वजह से कर रहा है। पूरी तरह से कॉर्पोरेट और कारोबारी सौदे वाले इस मसले में भी जबरन सत्ता के डर का नैरेटिव ठूंस दिया गया।
दूसरी तरफ का तमाशा देखिए, जहां मद्रास आईआईटी के कुछ होनहार युवाओं ने 'झूठ की गूंज' नाम से एक वेबसाइट बनाई, जिसका काम केवल राहुल गांधी के बयानों और भाषणों का बिंदुवार फैक्ट चेक करना था। कायदे से तो इसमें कुछ गलत नहीं था, लेकिन कर्नाटक कांग्रेस के मीडिया सेल से यह सहन नहीं हुआ। कर्नाटक की कांग्रेस सत्ता ने अपनी पूरी ताकत दिखाते हुए 27 अगस्त को बेंगलुरु साइबर क्राइम सेल में वेबसाइट और उन अनजान छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी। एफआईआर में दलील दी गई कि वेबसाइट का दावा गलत है और राहुल जी के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।
अब इस पाखंड की विडंबना को समझिए। जहां एक निजी प्रकाशक के तथ्यों की मांग को ये बुद्धिजीवी सत्ता का डर बताकर छाती पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ अपनी राज्य सरकार की पुलिसिया ताकत का इस्तेमाल कर उन युवाओं की आवाज पर एफआईआर का ताला जड़ते हैं जो सिर्फ इनके झूठ की पड़ताल कर रहे थे। वजह साफ है कि कांग्रेस के स्वयंभू बौद्धिकों में इतना माद्दा ही नहीं बचा कि वे सार्वजनिक मंच पर इन युवाओं के फैक्ट चेक का तथ्यों से सामना कर सकें। इन दोनों तस्वीरों को साथ रखिए और खुद तय कीजिए कि असल में अभिव्यक्ति की आजादी का गला कौन घोंट रहा है और खौफ की सियासत कौन चला रहा है।
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