जब कांग्रेस के नेता विदेशी तानाशाहों और नेताओं से गले मिलते थे, तो वह विश्व बंधुत्व और महान विदेश नीति कहलाती थी


 जब हिसाब बराबर करने की नौबत आएगी तो राहुल गांधी और उनकी पूरी चमचों की जमात को मुंह छुपाने की जगह नहीं मिलेगी। जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक नेताओं के साथ गर्मजोशी, कूटनीतिक पकड़ या प्रोटोकॉल तोड़कर मिलने वाली तस्वीरों पर तंज कसा जाता है, तब असल में कांग्रेस अपने ही खोदे गड्ढे में गिरती है। दूसरों की विदेश नीति पर उंगली उठाने से पहले राहुल गांधी को अपने खानदान और अपनी पार्टी के काले पन्नों को पलटकर देखना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जब बात कूटनीति और मुलाक़ातों की निकलेगी, तो हर पुरानी फाइल की धूल हटेगी और कांग्रेस का दोहरा चरित्र पूरी दुनिया के सामने बेनकाब होगा।


इस हिसाब-किताब में सबसे पहला नाम देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का आएगा। वही नेहरू जो 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के खोखले नारों के बीच चाऊ एन लाई के गले लग रहे थे। नेहरू की उसी तथाकथित कूटनीतिक झप्पी और आंख मूंदकर किए गए भरोसे की कीमत इस देश ने 1962 में अपनी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन गंवाकर और हमारे वीर जवानों की शहादत देकर चुकाई थी। चाऊ एन लाई के साथ नेहरू की वे तस्वीरें सिर्फ मुलाकातें नहीं थीं, बल्कि भारत की पीठ में छूरा घोंपने की पटकथा थीं। आज मोदी के गले मिलने पर सवाल उठाने वाले राहुल गांधी को पहले नेहरू की उस ऐतिहासिक भूल और रणनीतिक नाकामी का जवाब देश को देना चाहिए।







कहानियां यहीं नहीं रुकेंगी, बात आगे बढ़कर इंदिरा गांधी के दौर तक भी जाएगी। जब 1983 के गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में फिदेल कास्त्रो ने सार्वजनिक मंच पर इंदिरा गांधी को अचानक बांहों में भरकर गले लगा लिया था, तब कांग्रेस उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का सम्मान और कूटनीतिक जीत बता रही थी। फिदेल कास्त्रो की उस बेतकल्लुफ झप्पी पर वाहवाही लूटने वाले कांग्रेसी आज नरेंद्र मोदी की हर मुलाकात में खोट ढूंढने बैठ जाते हैं। इतना ही नहीं, फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात के साथ इंदिरा और गांधी परिवार के बेहद करीबी, भावुक और गले मिलने वाले संबंधों को दशकों तक महान कूटनीति के तमगे पहनाए गए।

जब कांग्रेस के नेता विदेशी तानाशाहों और नेताओं से गले मिलते थे, तो वह विश्व बंधुत्व और महान विदेश नीति कहलाती थी, लेकिन जब आज नरेंद्र मोदी भारत के स्वाभिमान को सिरमौर बनाकर विश्व के सबसे ताकतवर नेताओं से बराबरी की हैसियत में गर्मजोशी से मिलते हैं, तो राहुल गांधी को उसमें खोट नजर आने लगता है। सच्चाई यह है कि राहुल गांधी खुद विदेशों में जाकर देश की छवि को नुकसान पहुंचाने और विदेशी ताकतों से गुहार लगाने की सियासत करते हैं, जबकि नरेंद्र मोदी की मुलाक़ातों से दुनिया में भारत का डंका बजता है।

अब अगर राहुल गांधी और उनके दरबारी फिर पूछें कि पुराना हिसाब क्यों खोलते हो, तो उन्हें सीधा और साफ जवाब मिलना चाहिए कि यह आग आपने ही लगाई थी और बात आपने ही छेड़ी थी। सियासत में जब तस्वीरें बयान बनती हैं और पुरानी मुलाक़ातों को भूलकर दूसरों पर तंज कसने की कोशिश की जाती है, तो आईना दिखाना जरूरी हो जाता है। अगर बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी, नेहरू से लेकर इंदिरा और राजीव से लेकर राहुल तक, हर किसी की कूटनीतिक नाकामियों की पोल खुलेगी और आज का यह सच कल की सबसे बड़ी सुर्खी बनकर कांग्रेस के पाखंड को तार-तार करेगा।

--- लोकेश कुशवाहा 


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