15 अगस्त 1947 को आजादी मिली लेकिन लाखों लोगों तो पता ही नहीं था कि वह भारत में है या पाकिस्तान में
14 अगस्त की वह काली आधी रात जिसे इतिहास की किताबों में आजादी का जश्न बताया गया, वास्तव में लाखों मासूमों की नियति के साथ खेला गया इतिहास का सबसे खौफनाक और घिनौना मजाक था। जब राजधानी के सत्ता के गलियारों में आजादी के तराने गाए जा रहे थे, ठीक उसी वक्त सरहदों पर बसी करोड़ों की आबादी इस मुगालते में जी रही थी कि अगली सुबह उनका वजूद किस मुल्क का हिस्सा होगा। ब्रिटिश हुकूमत के प्यादे सिरिल रेडक्लिफ ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर महज पांच हफ्तों के भीतर एक प्राचीन सभ्यता के सीने पर नक्शों और स्याही की ऐसी खूनी लकीर खींच दी, जिसने सदियों पुराने रिश्तों, आस्थाओं और जिंदगियों को बेरहमी से काट कर रख दिया। सबसे बड़ा षड्यंत्र तो यह था कि विभाजन की यह रिपोर्ट 12 अगस्त को ही मुकम्मल हो चुकी थी, मगर सत्ता के ठेकेदारों ने दंगों और बगावत के खौफ से इसे 17 अगस्त तक एक गहरी तिजोरी में दबाए रखा। आजादी के दिन किसी आम इंसान को यह खबर तक नहीं थी कि उसका अपना घर किस देश की जमीन पर खड़ा है, और उस दौर के सबसे बड़े नेता मोहनदास करमचंद गांधी भी इस भयावह धोखे पर पूरी तरह खामोश रहे।
इस आपराधिक गोपनीयता ने जमीन पर 'द मिडनाइट फ्लैग स्वैप' नाम के एक ऐसे रूह कंपा देने वाले भ्रम को जन्म दिया, जिसने इंसानी जिंदगियों को तमाशा बना दिया। 15 अगस्त की सुबह लगभग 70 प्रतिशत मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद ने खुद को पाकिस्तान का हिस्सा मानकर वहां के ऐतिहासिक हजारदुआरी पैलेस पर हरा झंडा फहरा दिया। दूसरी ओर, हिंदू बहुल खुलना जिले के लोगों ने अपनी सदियों पुरानी मिट्टी और भारत के साथ रहने की उम्मीद में गर्व से तिरंगा लहरा दिया। किसी को भनक तक नहीं थी कि उनके भाग्य का फैसला पहले ही एक बंद लिफाफे में लिखा जा चुका है। 17 अगस्त को जब वह मनहूस नक्शा सार्वजनिक किया गया, तो जमीन के साथ-साथ करोड़ों लोगों की रूहें हिल गईं। कलकत्ता पोर्ट को बचाने की कूटनीतिक सौदेबाजी के तहत मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद को भारत में शामिल कर लिया गया, और इस सियासी सौदे का हिसाब बराबर करने के लिए हिंदू बहुल खुलना को बेरहमी से पूर्वी पाकिस्तान के हवाले कर दिया गया। जिसका खामियाजा हिंदुओं को भुगतना पड़ा। भारत में होते हुए भी मुर्शिदाबाद में आजादी के समय मुसलमानों की जनसंख्या 55% थी जो वर्तमान में बढ़कर 66% हो गई है, जबकि हिंदुओं की जनसंख्या 44% थी जो घटकर 33% हो गई है।
इस प्रकार हिन्दू बहुल खुलना जिला पाकिस्तान में चला गया। विभाजन के समय खुलना जिला में 52% हिन्दू थे जो वर्तमान में घटकर 20% रह गए है।
इसलिए मैने कहा कि खामियाजा हिंदुओं को ही भुगतना पड़ा चाहे वह भारत में हो, या पाकिस्तान में।
यह भयावह तबाही सिर्फ खुलना या मुर्शिदाबाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि मालदा, नादिया, दिनाजपुर और जैसोर जैसे तमाम सीमावर्ती इलाकों में कयामत का मंजर था। रातों-रात पूरे के पूरे पुलिस महकमे बदल गए, व्यवस्थाएं उलट-पुलट हो गईं, और लोग जब सुबह सोकर उठे तो उन्होंने पाया कि उनका खेत भारत में था और जिस छत के नीचे वे सो रहे थे, वह पाकिस्तान बन चुकी थी। यह विभाजन विशेषकर हिंदुओं के लिए एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और असहनीय त्रासदी साबित हुआ। जो लोग कल तक आजादी के जश्न में शामिल थे, वे परसों सुबह होते ही अपनी ही पैतृक धरती पर शरणार्थी बनकर दर-दर भटकने को मजबूर कर दिए गए। इतिहास ने बड़ी सफाई से यह झूठ गढ़ दिया कि हमें एक शांतिपूर्ण आजादी मिली, जबकि हकीकत यह है कि धर्म के नाम पर देश का अंग-भंग कर एक तरफ तो इस्लामिक स्टेट बना दिया गया, लेकिन दूसरी तरफ भारत को आज भी एक सेकुलर धर्मशाला बनाकर छोड़ दिया गया, जिसका भारी और खौफनाक दंश हिंदुओं को विभाजन के दिन से लेकर आज तक और शायद आने वाले भविष्य में भी लगातार भुगतना पड़ रहा है।
--- लोकेश कुशवाहा
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