30 अगस्त 1574 को गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु बने थे
30 अगस्त 1574 को गुरु रामदास जी सिखों के चौथे गुरु बने थे, जिन्हें यह गुरुगद्दी अपने ससुर और तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी से प्राप्त हुई थी। सिख इतिहास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उन्होंने ही पवित्र शहर अमृतसर की स्थापना की थी, जिसे शुरुआती समय में 'रामदासपुर' के नाम से जाना जाता था। इसके साथ ही उन्होंने अमृतसर में पवित्र संतोखसर सरोवर की खुदाई का कार्य भी शुरू करवाया था। धार्मिक और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में उन्होंने सिख विवाह समारोह यानी आनंद कारज के दौरान पढ़ी जाने वाली चार 'लवाण' (फेरों के सूक्त) की रचना की थी, जिसका पालन आज भी सिख परंपराओं में पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है।
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