चाय को लेकर राहुल गांधी का हालिया बयान उनकी जमीनी हकीकत
राहुल गांधी का हालिया बयान उनकी जमीनी हकीकत से कटी हुई सोच और समाज में विभाजन पैदा करने की सियासत का एक और प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर सामने आया है। उन्होंने देश भर की चाय की दुकानों को लेकर एक ऐसा अजीबोगरीब और बेतुका दावा पेश किया, जिसे सुनकर कोई भी आम नागरिक हैरान रह जाएगा। राहुल गांधी के अनुसार देश की चाय की थड़ियों पर दो तरह के ग्लास होते हैं एक कांच का रीयूजेबल ग्लास और दूसरा इस्तेमाल करके फेंक देने वाला डिस्पोजेबल ग्लास। उनके इस बेतुके तर्क के मुताबिक, सवर्ण समाज के लोग कांच के गिलासों में चाय पीते हैं, जबकि दलितों और अन्य जातियों के लोगों को डिस्पोजेबल गिलासों में चाय दी जाती है।
यह बयान उनकी घोर अज्ञानता और जमीनी वास्तविकताओं से पूरी तरह अनभिज्ञ होने का जीता-जागता सबूत है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने कभी आम जनता के बीच बैठकर किसी सामान्य चाय की दुकान पर चाय पीने का अनुभव ही नहीं किया है, फिर भी हर सामान्य और रोजमर्रा की चीज में जबरन जातिवाद घुसाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। असल में हिंदू समाज को बांटने और वर्ग-विभाजन का झूठा नैरेटिव खड़ा करने का एक तय एजेंडा चलाया जा रहा है, लेकिन जमीनी सच्चाई की समझ न होने के कारण जो भी स्क्रिप्ट तैयार की जाती है, उसका हर बार इसी तरह गुड़-गोबर हो जाता है।
इस दोहरेपन और पाखंड की पोल तब पूरी तरह खुल गई, जब खुद राहुल गांधी के अपने वीडियो जनता के सामने आ गए। इन वीडियोज में साफ देखा जा सकता है कि वे खुद तो महंगे, बेहतरीन कप और कांच के गिलासों में चाय की चुस्कियां ले रहे हैं, जबकि उनके साथ बैठे उनके अपने ही सहयोगियों और कार्यकर्ताओं को डिस्पोजेबल गिलासों में चाय पिलाई जा रही है। जो नेता चाय की दुकान के गिलासों में जातिगत भेदभाव का मनगढ़ंत पाठ पढ़ा रहा था, वह खुद अपने साथियों के साथ दोहरे मापदंड अपनाते हुए कैमरे पर बेनकाब हो गया। यह साफ दिखाता है कि असल समस्या समाज में नहीं, बल्कि उन स्क्रिप्टेड बयानों और खोखले दावों में है जो केवल समाज में फूट डालने के मकसद से गढ़े जाते हैं।
-- लोकेश कुशवाहा
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