पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए
पाकिस्तान के हुक्मरानों की बयानबाजी भी किसी अजब-गजब नाटक से कम नहीं लगती। जिस मुल्क की पूरी राजनीति और अस्तित्व ही भारत-विरोध की जमीन पर टिका हो, उसके वजीर-ए-आजम अपनी खोखली धमकियों को वजनदार बनाने के लिए भारतीय संस्कृति के महाकाव्य रामायण से उधार ली गई लक्ष्मण रेखा का मुहावरा इस्तेमाल कर रहे हैं। पानी की हर एक बूंद को अपनी संप्रभुता बताने वाले यह भूल जाते हैं कि जिस पानी पर वे अपनी जागीर का दावा ठोक रहे हैं, वह दशकों से सिंधु जल समझौते के तहत भारत के संयम और सद्भाव की बदौलत ही उनकी तरफ बह रहा है। अपनी जनता को बुनियादी जरूरतें देने में नाकाम हुकूमत जब भारत को अक्ल सिखाने और सीधा जवाब देने की गर्जना करती है, तो दुनिया डरने के बजाय केवल ठहाके लगाती है।
हकीकत तो यह है कि पाकिस्तान को पानी की बूंदों की चिंता सीमाओं पर नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर करनी चाहिए। कराची की सड़कों पर बूंद-बूंद के लिए टैंकर माफिया आम अवाम को लूट रहा है, सिंध और पंजाब प्रांतों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर आए दिन तलवारें खिंच जाती हैं, और बलूचिस्तान के लोग एक घूंट साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। दशकों से जो मुल्क अपनी नदियों के पानी को सहेजने के लिए ढंग के बांध तक नहीं बना सका और मानसून के दिनों में अपने ही प्रशासनिक कुप्रबंधन के चलते सैलाब में डूब जाता है, वह आज भारत पर पानी छीनने का झूठा विलाप कर रहा है। अपनी प्रशासनिक विफलता, जर्जर नहरों और भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए हर समस्या का ठीकरा भारत के सिर फोड़ना वहां के हुक्मरानों का सबसे पुराना और आजमाया हुआ राजनीतिक नुस्खा है।
इस बयान का सबसे हास्यास्पद पहलू सीधा जवाब देने की वह चेतावनी है, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। जिस देश का खजाना पूरी तरह खाली हो, जिसकी अर्थव्यवस्था विदेशी कर्जों और आईएमएफ की किश्तों के सहारे वेंटिलेटर पर चल रही हो, वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक और सामरिक महाशक्ति को आंखें दिखाने का दुस्साहस कर रहा है। जब देश में आटा, दाल, बिजली और गैस की किल्लत से अवाम त्राहि-त्राहि कर रही हो, तब जंग का डर दिखाकर लोगों का ध्यान भटकाना ही वहां के सत्ताधारियों का एकमात्र सहारा बचता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब पाकिस्तान ने भारत को सीधा जवाब देने की हिमाकत की है, तब-तब उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिर्फ शर्मिंदगी और शिकस्त ही हाथ लगी है। ऐसे में पानी पर लक्ष्मण रेखा खींचने की बातें केवल उन मुंगेरीलाल के हसीन सपनों जैसी हैं, जो खाली कटोरे की खनक के पीछे अपनी लाचारी छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
--- लोकेश कुशवाहा
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