भविष्य पुराण को अशुद्ध और विकृत करने का ब्रिटिश षड्यंत्र
भविष्य पुराण को अशुद्ध और विकृत करने का ब्रिटिश षड्यंत्र 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल और ईसाई मिशनरियों के गठजोड़ द्वारा रचा गया था। इस पूरी जालसाजी की शुरुआत सन 1800 के बाद तब हुई, जब अंग्रेजों ने महसूस किया कि तलवार के बल पर भारतीयों का धर्मांतरण करना असंभव है, इसलिए उन्होंने भारत के प्राचीन धार्मिक वांग्मय को ही भीतर से खोखला करने की नीति अपनाई। भविष्य पुराण अपनी प्रकृति के कारण इस षड्यंत्र के लिए सबसे आसान लक्ष्य बना, क्योंकि इसमें इतिहास को भविष्य की वंशावलियों के रूप में लिखने की एक पारंपरिक शैली पहले से मौजूद थी।
इस औपनिवेशिक साजिश को अंजाम देने के लिए अंग्रेजों ने संस्कृत के कुछ स्थानीय लालची, हिन्दू विरोधी और वामपंथ से प्रेरित लोगों को आर्थिक संरक्षण दिया और उनसे भारी मात्रा में नए श्लोक लिखवाए। इन जाली श्लोकों को भविष्य पुराण के 'प्रतिसर्ग पर्व' में शामिल किया गया, जिसका प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों में कोई वजूद नहीं था। इस मिलावट का मुख्य रणनीतिक उद्देश्य यह था कि जब कोई साधारण हिंदू अपने ग्रंथों को पढ़े, तो उसे लगे कि ईसा मसीह (ईशपुत्र) या मोहम्मद (महामद) जैसे विदेशी चरित्र और ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया का शासन तो पहले से ही उनके शास्त्रों द्वारा प्रमाणित और स्वीकृत है। ईसाई मिशनरियों ने इसके जरिए बाइबल की 'जेनेसिस' यानी सृष्टि की उत्पत्ति की कहानियों को हुबहू संस्कृत श्लोकों में ढालकर 'आदमा' (आदम) और 'हव्यवती' (हव्वा) जैसे कृत्रिम पात्र गढ़ दिए, ताकि हिंदू समाज को यह विश्वास दिलाया जा सके कि उनका मूल इतिहास भी अब्राहमिक मतों से ही जुड़ा हुआ है।
यह षड्यंत्र भाषाई और ऐतिहासिक स्तर पर पूरी तरह असफल साबित हुआ, क्योंकि अंग्रेजों और उनके सहयोगियों ने जल्दबाजी में ऐसी तकनीकी गलतियाँ कर दीं जो सनातन ग्रंथों की मूल प्रकृति से मेल नहीं खाती थीं। उन्होंने अंग्रेजी कैलेंडर के 'फरवरी' महीने को जबरन संस्कृत जैसा रूप देने के लिए 'फाल्गुन' शब्द का विकृत उपयोग किया और कलकत्ता शहर की ब्रिटिश इमारतों तक का हुबहू वर्णन पुराण में डाल दिया, जबकि प्राचीन पुराणों का भूगोल केवल पौराणिक जम्बूद्वीप और भारतवर्ष की पवित्र नदियों तथा पर्वतों तक सीमित था। ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह पूरी तरह प्रमाणित हो चुका है कि बॉम्बे के वेंकटेश्वर प्रेस द्वारा 19वीं सदी के अंत में प्रकाशित भविष्य पुराण का संस्करण पूरी तरह इसी ब्रिटिश हस्तक्षेप से प्रभावित था, क्योंकि उससे पहले की कोई भी ऐसी प्राचीन पांडुलिपि (मैनुस्क्रिप्ट) आज तक दुनिया के किसी पुस्तकालय में नहीं मिली जिसमें ये जाली विदेशी कहानियां मौजूद हों। इस प्रकार, हिंदू धर्मग्रंथों को अशुद्ध करके भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने का अंग्रेजों का यह साहित्यिक प्रयास अंततः अकादमिक और भाषाई कसौटियों पर पूरी तरह बेनकाब और असफल हो गया।
आज भी कई मूर्ख नेता, तथाकथित बुद्धिजीवी, सेलिब्रिटी उन्हीं अशुद्ध अनुवाद का जिक्र करके अपनी राजनीतिक और वामपंथी विचारधारा का झूठा ढिंढोरा पीटते हुए नजर आ जाते है जिनके पास कोई प्राइमरी तथ्य उपलब्ध नहीं होता।
-- लोकेश कुशवाहा
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