ब्रिटेन के आम ग्राहकों के लिए "इंडियन करी" का षड्यंत्र
ब्रिटेन की हर गली-नुक्कड़ पर दिखने वाले तथाकथित "इंडियन करी हाउस" का सच ब्रिटिश खान-पान के इतिहास का सबसे बड़ा और दिलचस्प विरोधाभास है। बाहर बोर्ड पर गर्व से "इंडियन रेस्टोरेंट" लिखा होता है, लेकिन किचन से लेकर गल्ले तक की कमान असल में बांग्लादेशी और पाकिस्तानी मूल के प्रवासियों के हाथों में होती है। आंकड़ों की हकीकत यह है कि ब्रिटेन के करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय रेस्टोरेंट का संचालन बांग्लादेशी, खासतौर पर सिलहट क्षेत्र से आए उद्यमी करते हैं, जबकि एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तानियों के नियंत्रण में है। यह कोई अनजाने में हुआ संयोग नहीं, बल्कि दशकों से चला आ रहा एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति और ब्रांडिंग का खेल है।
इस मुखौटे की सबसे बड़ी वजह "इंडिया" नाम की ऐतिहासिक और वैश्विक ब्रांड वैल्यू है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर से ही अंग्रेजों के दिमाग में मसालों, समृद्ध संस्कृति और खान-पान की पहचान सीधे भारत से जुड़ी हुई थी। ब्रिटेन के आम ग्राहकों के लिए "इंडियन करी" एक जाना-पहचाना, भरोसेमंद और सकारात्मक स्वाद का प्रतीक बन चुका था। इसके विपरीत, 1947 के बंटवारे और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद बने पाकिस्तान और बांग्लादेश ब्रिटिश समाज के लिए अनजान और राजनीतिक रूप से संवेदनशील नाम थे। नए प्रवासियों को अच्छी तरह समझ आ गया था कि एक अनजान देश के नाम पर खाना बेचने में घाटे का जोखिम है, जबकि "इंडियन" लेबल लगाते ही बना-बनाया बाजार और ग्राहक तुरंत मिल जाते हैं।
व्यावसायिक व्यावहारिकता ने इस रणनीति को और मजबूत किया। जब 1970 और 1980 के दशक में बांग्लादेशी प्रवासियों ने लंदन के ब्रिक लेन से लेकर ब्रिटेन के छोटे-बड़े शहरों तक रेस्टोरेंट कारोबार में भारी निवेश किया, तब तक बाजार में "इंडियन फूड" पहले से ही एक स्थापित उद्योग बन चुका था। चिकन टिक्का मसाला से लेकर मद्रास करी तक, ब्रिटिश लोग इसी मेन्यू के आदी हो चुके थे। एक पूरी तरह से नई और अलग पहचान बनाने के लिए भारी विज्ञापन और वर्षों की मशक्कत करने के बजाय, इन उद्यमियों ने उसी स्थापित "इंडियन" ब्रांड की सवारी करना सबसे सुरक्षित और मुनाफेदार रास्ता समझा।
यही वजह है कि दशकों से ब्रिटिश समाज जिसे विशुद्ध "भारतीय भोजन" समझकर चाव से खाता रहा, वह असल में बांग्लादेशी और पाकिस्तानी शेफ्स द्वारा ब्रिटिश जुबान के हिसाब से तैयार किया गया एक खास ब्रिटिश-एशियाई स्वाद था। पहचान छुपाने की यह मजबूरी धीरे-धीरे एक बेहद सफल बिजनेस मॉडल में तब्दील हो गई, जिसने अपनी मूल राष्ट्रीय पहचान को पीछे छोड़कर "इंडिया" ब्रांड के नाम पर अरबों पाउंड का विशाल साम्राज्य खड़ा कर दिया।
-- लोकेश कुशवाहा
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