13 अगस्त 1891 को मणिपुर की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले महान नायक युवराज बीर टिकेंद्रजीत सिंह और उनके वफादार जनरल थंगल को ब्रिटिश हुकूमत ने इम्फाल के पोलो ग्राउंड में हजारों लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी थी।


 

13 अगस्त 1891 का दिन भारतीय इतिहास और विशेष रूप से मणिपुर के गौरवशाली इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावुक कर देने वाला अध्याय है। इस दिन मणिपुर की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा के लिए लड़ने वाले महान नायक युवराज बीर टिकेंद्रजीत सिंह और उनके वफादार जनरल थंगल को ब्रिटिश हुकूमत ने इम्फाल के पोलो ग्राउंड (जिसे अब बीर टिकेंद्रजीत पार्क कहा जाता है) में हजारों लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी थी। इन दोनों वीर योद्धाओं ने ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों के सामने घुटने टेकने के बजाय मातृभूमि की संप्रभुता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। मणिपुर के लोग हर साल 13 अगस्त को इन महान सपूतों और आंग्ल-मणिपुर युद्ध के सभी अज्ञात शहीदों के बलिदान को याद करते हुए 'देशभक्त दिवस' (Patriots' Day) के रूप में मनाते हैं।

इस ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि 1891 के आंग्ल-मणिपुर युद्ध से जुड़ी है। उस समय मणिपुर के शाही परिवार में आंतरिक मतभेद चल रहे थे, जिसका फायदा उठाकर ब्रिटिश सरकार ने राज्य के मामलों में सीधा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था। राजकुमार बीर टिकेंद्रजीत, जो मणिपुर सेना के कमांडर भी थे, अंग्रेजों की इस विस्तारवादी नीति को अच्छी तरह समझते थे और उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया। जब ब्रिटिश अधिकारियों ने मणिपुर के तत्कालीन राजा को हटाने और बीर टिकेंद्रजीत को गिरफ्तार करने की साजिश रची, तो मणिपुर के लोगों और सेना ने उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लिए। इस संघर्ष में असम के मुख्य आयुक्त जेडब्ल्यू क्विंटन सहित कई उच्च पदस्थ ब्रिटिश अधिकारी मारे गए, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था।

इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने मणिपुर पर चारों तरफ से एक बड़ा सैन्य हमला बोल दिया, जिसे इतिहास में आंग्ल-मणिपुर युद्ध के नाम से जाना जाता है। मणिपुर के वीरों ने आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश सेना का बहादुरी से सामना किया, लेकिन अंततः उन्हें हार का सामना करना पड़ा। युद्ध के बाद अंग्रेजों ने युवराज बीर टिकेंद्रजीत, जनरल थंगल और अन्य प्रमुख नेताओं को बंदी बना लिया। उन पर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने और राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, जो पूरी तरह से एकतरफा था। अंततः 13 अगस्त को उन्हें मृत्युदंड दिया गया। आज इम्फाल में उसी स्थान पर एक भव्य शहीद मीनार खड़ी है, जो आने वाली पीढ़ियों को उनके अदम्य साहस, देशभक्ति और सर्वोच्च बलिदान की याद दिलाती रहती है।

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