13 अगस्त 1947 को त्रिपुरा की महारानी कंचनप्रभा देवी ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए विलय के समझौते (Instrument of Accession) पर ऐतिहासिक हस्ताक्षर किए थे


 13 अगस्त 1947 को त्रिपुरा की महारानी कंचनप्रभा देवी ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए विलय के समझौते (Instrument of Accession) पर ऐतिहासिक हस्ताक्षर किए थे, जो भारत की स्वतंत्रता से ठीक दो दिन पहले का एक बड़ा फैसला था। इस पूरी घटनाक्रम के पीछे एक गहरा ऐतिहासिक संकट था, क्योंकि त्रिपुरा के अंतिम शासक महाराजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य का भारत की आजादी से कुछ महीने पहले, 17 मई 1947 को अचानक असमय निधन हो गया था। उनके निधन के बाद उनके बेटे किरीट बिक्रम किशोर माणिक्य गद्दी पर बैठे, लेकिन उस समय उनकी उम्र महज 13 वर्ष थी और वे एक नाबालिग थे। इस प्रशासनिक शून्य को भरने के लिए महारानी कंचनप्रभा देवी की अध्यक्षता में एक काउंसिल ऑफ रीजेंसी (संरक्षक परिषद) का गठन किया गया, जिसकी कमान संभालते हुए उन्होंने राज्य के शासन और सुरक्षा के फैसले लेने शुरू किए। भारत के विभाजन के उस दौर में त्रिपुरा चौतरफा संकटों से घिर गया था, क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की भौगोलिक निकटता के कारण राज्य पर आंतरिक और बाहरी ताकतों का भारी दबाव था और विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे भी हो रहे थे। महल के भीतर और बाहर से पैदा हो रहे इस दबाव और भारत से अलग करने की साजिशों को भांपते हुए महारानी कंचनप्रभा देवी ने देश के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से संपर्क किया और बंगाल कांग्रेस कमेटी के माध्यम से केंद्र को त्रिपुरा की नाजुक स्थिति से अवगत कराया। इसके बाद, भारत सरकार की सलाह पर उन्होंने इस राजनीतिक अस्थिरता को खत्म करने के लिए 12 जनवरी 1948 को काउंसिल ऑफ रीजेंसी को पूरी तरह भंग कर दिया और स्वयं राज्य की एकमात्र संरक्षक (सोल रीजेंट) बन गईं। इस कूटनीतिक और साहसिक सफर का अंतिम और निर्णायक मोड़ तब आया जब दो साल के लंबे राजनीतिक घटनाक्रम और वार्ताओं के बाद, महारानी ने 9 सितंबर 1949 को नई दिल्ली में औपचारिक 'त्रिपुरा विलय समझौते' (Tripura Merger Agreement) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता 15 अक्टूबर 1949 को पूरी तरह प्रभावी हुआ और सदियों पुराने माणिक्य राजवंश के संप्रभु शासन का अंत हो गया, जिसके साथ ही त्रिपुरा औपचारिक और पूर्ण रूप से भारतीय संघ का एक अभिन्न अंग बन गया। इसके बाद भारत सरकार के मुख्य आयुक्त ने राज्य का प्रशासन संभाला और आगे चलकर 21 जनवरी 1972 को त्रिपुरा को भारत के एक पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।

--- लोकेश कुशवाहा 


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