13 अगस्त 1947 को हैदराबाद के अंतिम निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने ब्रिटिश भारत की समाप्ति पर एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने राज्य को न तो भारत और न ही पाकिस्तान में शामिल करने की घोषणा की
13 अगस्त 1947 को हैदराबाद के अंतिम निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने ब्रिटिश भारत की समाप्ति पर एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने राज्य को न तो भारत और न ही पाकिस्तान में शामिल करने की घोषणा की, बल्कि इसे एक स्वतंत्र संप्रभु रियासत बनाए रखने का इरादा जताया। हैदराबाद उस समय क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी और समृद्ध रियासतों में से एक थी। निज़ाम के पास अपनी खुद की सेना, रेलवे नेटवर्क, डाक विभाग और मुद्रा थी। इस आर्थिक और सैन्य आत्मनिर्भरता के बल पर वे हैदराबाद को एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थापित करना चाहते थे, भले ही उनका राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था।
भारत सरकार और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल हैदराबाद को भारत संघ का हिस्सा बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। भौगोलिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत के ठीक बीच में एक स्वतंत्र विदेशी राज्य का होना देश की अखंडता के लिए बड़ा खतरा था। नवंबर 1947 में दोनों पक्षों के बीच एक वर्ष के लिए यथास्थिति समझौता भी हुआ, ताकि बातचीत से कोई शांतिपूर्ण रास्ता निकाला जा सके। इस दौरान हैदराबाद के भीतर हालात बिगड़ने लगे। निज़ाम के समर्थक कासिम रिज़वी के नेतृत्व वाले रजाकारों नामक चरमपंथी संगठन ने स्थानीय जनता पर अत्याचार शुरू कर दिए, जिससे राज्य में भारी अराजकता फैल गई।
जब कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह विफल हो गए और मानवाधिकारों का उल्लंघन बढ़ने लगा, तब भारत सरकार ने सैन्य कदम उठाने का निर्णय लिया। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने हैदराबाद के खिलाफ एक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसे 'ऑपरेशन पोलो' का कोड नाम दिया गया था। केवल पांच दिनों तक चली इस कार्रवाई के बाद निज़ाम की सेना टिक नहीं सकी। आखिरकार 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद के सैन्य कमांडर मेजर जनरल अल इदरूस ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार हैदराबाद रियासत का भारत संघ में औपचारिक विलय हुआ और निज़ाम को राज्य के राजप्रमुख के रूप में बरकरार रखा गया।
हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान द्वारा पाकिस्तान को दिए गए समर्थन का इतिहास बहुत गहरा और रणनीतिक था। विभाजन के समय निजाम का मुख्य उद्देश्य हैदराबाद को एक स्वतंत्र देश बनाए रखना था, लेकिन भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण वे जानते थे कि उन्हें एक मजबूत सहयोगी की जरूरत होगी। इसी रणनीति के तहत उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना और पाकिस्तान की नवगठित सरकार के साथ नजदीकी संबंध बनाए। जब पाकिस्तान आजादी के तुरंत बाद गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब निजाम ने उसे बीस करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज देकर आर्थिक रूप से संभाला था, जो उस दौर में एक बहुत बड़ी रकम थी। इसके बदले में पाकिस्तान ने निजाम को भारत के खिलाफ हर संभव कूटनीतिक और सैन्य मदद का भरोसा दिया था।
--- लोकेश कुशवाहा
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