स्वतंत्र भारत की पुरुष हॉकी टीम ने इतिहास रचते हुए पहली बार एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था।
12 अगस्त 1948 को लंदन के प्रतिष्ठित वेम्बली स्टेडियम में स्वतंत्र भारत की पुरुष हॉकी टीम ने इतिहास रचते हुए पहली बार एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था। आजादी के ठीक 362 दिन बाद और स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगांठ से महज तीन दिन पहले मिली यह जीत भारतीय खेल इतिहास के सबसे गौरवशाली क्षणों में से एक मानी जाती है, क्योंकि फाइनल मुकाबले में भारत का सामना उसी ग्रेट ब्रिटेन से था जिसने सदियों तक भारत पर शासन किया था। इस बेहद रोमांचक और ऐतिहासिक फाइनल मैच में कप्तान किशन लाल के नेतृत्व में उतरी भारतीय टीम ने ब्रिटिश टीम पर पूरी तरह दबदबा बनाते हुए उन्हें 4-0 के बड़े अंतर से करारी शिकस्त दी थी। मैच के दौरान भारत की ओर से दिग्गज खिलाड़ी बलवीर सिंह सीनियर ने बेहतरीन खेल दिखाते हुए 2 शानदार गोल दागे, जबकि त्रिलोचन सिंह बावा और पैट्रिक जेसन ने 1-1 गोल कर टीम की जीत सुनिश्चित कर दी थी।
यह ऐतिहासिक जीत इसलिए भी बेहद खास थी क्योंकि यह आजाद भारत का किसी भी ओलंपिक स्पर्धा में पहला स्वर्ण पदक था और पहली बार वैश्विक मंच पर ब्रिटिश झंडे की जगह भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराया गया तथा राष्ट्रगान 'जन गण मन' बजाया गया। हालांकि ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारत ने साल 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में लगातार तीन स्वर्ण पदक जीते थे, लेकिन 1948 का यह पदक स्वतंत्र भारत की अपनी पहचान और स्वाभिमान का प्रतीक था जिसने देश के हॉकी इतिहास में एक नए युग की शुरुआत की। विभाजन की त्रासदी और टीम के बिखराव के बाद भी खिलाड़ियों ने जिस अटूट हौसले के साथ ब्रिटेन को उसी की धरती पर हराया, उसने पूरे देश को एक सूत्र में बांधने और जश्न मनाने का एक ऐतिहासिक अवसर दिया था।
--- लोकेश कुशवाहा
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