मुलायम सिंह ने सत्ता में आते ही 1994 में नकल-विरोधी कानून को निरस्त करके नकल माफियाओं का भला किया।


 

1991 में जब उत्तर प्रदेश में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी, तब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री और राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री थे। उस दौर में यूपी बोर्ड की परीक्षाओं की साख पूरी तरह रसातल में जा चुकी थी। परीक्षा केंद्रों पर संगठित 'नकल माफिया' का कब्जा था और खुलेआम 'सामूहिक नकल' का व्यापार चलता था। उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को इस दीमक से बचाने के लिए तत्कनीन यूपी के शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक कड़ा कदम उठाने का फैसला किया। इसी मंशा के साथ 1992 में एंटी-कॉपी कानून यानी 'उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम' लागू किया गया।

इस कानून की सबसे सख्त और विवादास्पद विशेषता यह थी कि इसमें नकल करने और करवाने दोनों को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित कर दिया गया। पुलिस को अधिकार मिला कि वह सीधे परीक्षा केंद्रों में दाखिल होकर तलाशी ले सकती है। नतीजा यह हुआ कि परीक्षा कक्षों में पर्ची या बोलकर नकल कराने वालों के साथ-साथ रंगे हाथों पकड़े गए छात्रों को भी हथकड़ी लगाकर सीधे जेल भेजा जाने लगा। कानून लागू होते ही नकल माफिया में हड़कंप मच गया।

मुलायम सिंह यादव ने इस पूरे प्रशासनिक सुधार को सामाजिक और राजनीतिक रंग दे दिया। उन्होंने 'मंदिर बाद में, पहले बच्चों को पास कराओ' का नारा देकर परीक्षा में सख्ती को गरीब और ग्रामीण छात्रों के उत्पीड़न से जोड़ दिया। मुलायम सिंह यादव ने तर्क दिया कि यह कानून गरीब, पिछड़े, दलित और ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों को अपराधी बनाने की एक साजिश है। उन्होंने जनता से वादा किया कि उनकी सरकार आते ही इस "काले कानून" को कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा।

1993 के चुनाव परिणामों के बाद मुलायम सिंह यादव की बहुजन समाज पार्टी के सहयोग से सरकार बनी। दुर्भाग्य देखिये सत्ता संभालते ही मुलायम सिंह यादव ने सबसे पहला काम जनता और देशहित में बनाए इस "एंटी-कॉपी कानून" को पूरी तरह निरस्त करने का किया। कानून खत्म होते ही यूपी बोर्ड में नकल का वही पुराना माफिया तंत्र वापस लौट आया और बोर्ड की कॉपियों पर बिना पढ़ाई के नंबर बंटने का सिलसिला फिर शुरू हो गया, जिसने उत्तर प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था के स्तर और साख पर आने वाले कई दशकों के लिए गहरा आघात पहुंचाया।

मुलायम सिंह यादव द्वारा शुरू की गई इस तुष्टिकरण की राजनीति की झलक बाद के वर्षों में अखिलेश यादव के बयानों में भी साफ नजर आई। चुनाव और भाषणों के दौरान अखिलेश यादव ने 2017 में 'थोड़ी-बहुत नकल' को यह कहकर सामान्य ठहराने की कोशिश की कि "बचपन में थोड़ी बहुत नकल तो हर कोई कर लेता है, इसमें कुछ बुरा नहीं है"। यह सोच दर्शाती है कि समाजवादी पार्टी की छात्र-नीति मेरिट और कठोर परिश्रम के बजाय हमेशा से शॉर्टकट और वोटबैंक की रियायतों के इर्द-गिर्द घूमती रही।

विपक्ष आज भले ही शिक्षा व्यवस्था और नौकरियों पर बड़े-बड़े दावे करता हो, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यही बताते हैं कि जब-जब परीक्षा प्रणाली में सुधार और नकल पर नकेल कसने की सख्त कोशिशें हुईं, तब-तब विपक्षी खेमे ने इसे मुद्दा बनाकर छात्रों की भावनाओं से खिलवाड़ किया और राजनीतिक लाभ के लिए शिक्षा की गुणवत्ता और साख को ताक पर रख दिया।

--- लोकेश कुशवाहा 

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