टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थकों के लिए


 

राष्ट्र के गौरव और उसकी संप्रभुता से बढ़कर इस धरा पर कुछ नहीं होता, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, तुच्छ स्वार्थों और राजनीतिक लाभ के लिए उन लोगों के पीछे खड़ा होने लगता है जो देश को बाँटने का स्वप्न देखते हैं, तो उसकी आत्मा की मृतप्राय स्थिति पर तरस नहीं, बल्कि क्रोध आता है।

आजाद कश्मीर और "भारत तेरे टुकड़े होंगे" जैसे विषैले, राष्ट्रघाती और घिनौने नारे जब इस देश की हवाओं में गूँजते हैं, और उन्हें सुनकर भी यदि किसी का रक्त खौलने की बजाय शांत पड़ा रहता है, यदि किसी का हृदय तिलमिलाता नहीं, तो समझ लीजिए कि उस देह में संवेदना नहीं बल्कि नपुंसकता दौड़ रही है। ऐसे मोड़ पर हर उस व्यक्ति को अपनी रगों में बहते खून की शुद्धता की जाँच अवश्य करवा लेनी चाहिए। एक बार नहीं, सौ बार अपने कथित राष्ट्रप्रेम पर धिक्कार भेजना चाहिए और हजार बार अपने अस्तित्व की बुनियाद पर, अपनी माँ के चरित्र पर यह कठोर प्रश्न दागना चाहिए कि उस कुपुत्र के जन्म के समय क्या वह स्वयं सरहद पार पाकिस्तान गई थी, या फिर वहाँ से कोई कबीलाई उसकी अस्मत से खेलने आया था? क्योंकि जो अपनी मातृभूमि के बँटवारे के नारों पर चुप रह जाए, वह अपनी माँ के आँचल की रक्षा करने के काबिल भी नहीं हो सकता।

यह तीखा प्रहार सीधे-सीधे उन अवसरवादियों के सीने पर है जो केवल वोट बैंक की गणित बिठाने के लिए, अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए इन देशद्रोहियों के पैरोकार बन बैठते हैं। धिक्कार है उस उँगली पर जो ईवीएम का बटन दबाते समय उन पार्टियों को चुनती है जो इन 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' के विषधरों को अपनी गोद में बिठाकर दूध पिलाती हैं। जब आप शरजील इमाम जैसे षड्यंत्रकारियों का, जो पूर्वोत्तर भारत को देश से काटने की साजिशें रचते हैं, और उमर खालिद जैसे तत्वों का समर्थन करते हैं या उनके वकीलों के रूप में खड़े होते हैं, तो आप केवल एक अपराधी का साथ नहीं दे रहे होते, बल्कि आप उस मिट्टी के साथ गद्दारी कर रहे होते हैं जिसका अन्न खाकर आप बड़े हुए हैं। लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर देश की छाती पर छुरा घोंपने वाले इन गद्दारों और उनका बौद्धिक या राजनीतिक संरक्षण करने वालों का हाथ पकड़ना यह साबित करता है कि आपके लिए राष्ट्र का अस्तित्व नहीं, बल्कि आपका निजी स्वार्थ सर्वोपरि है। यह प्रश्न किसी वाद-विवाद का विषय नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की जमीर पर एक लहूलुहान तमाचा है जो देश को खोखला करने वालों के आगे नतमस्तक होता है।

--- लोकेश कुशवाहा 

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