भारत के जेन जी की करतूत


 

ओटीटी के पर्दे से गटर की तरह बही भाषा का कचरा आख़िरकार जंतर-मंतर के रास्तों से होकर देश के दीवानखानों तक पहुँच ही गया। सोशल मीडिया पर तैरती उन तस्वीरों और वीडियो ने नई पीढ़ी की तथाकथित 'क्रांतिकारी' युवतियों के चरित्र, संयम और संस्कारों की जो धज्जियाँ उड़ाई हैं, उसने पूरे समाज के माथे पर कलंक का टिका लगा दिया है। जब सड़कों पर खड़े होकर जुबान से आज़ादी के नाम पर नंगनाच किया जाएगा, तो कल को यही विकृति घरों के भीतर पहाड़ों से धकेलने, संदूकों में लाशें सड़ाने और नीले ड्रमों में रिश्तों को बंद करके नदियों में बहाने का दुस्साहस बनेगी। शबाना आजमी, अरुंधती रॉय और स्वरा भास्कर जैसे ठेकेदारों को आज अपनी इस 'प्रोग्रेसिव फसल' को लहलहाते देखकर यकीनन गहरा सुकून मिल रहा होगा, जिनका पूरा जीवन ही इस देश की पारिवारिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने और कुंवारे-अनब्याहे वंश की पौध तैयार करने में बीत गया।

जिस भारत की पहचान वीरांगनाओं के त्याग, शौर्य और गरिमा से थी, वहाँ ये बदजुबान, उच्छृंखल और जुबानी जुगली करने वाली जमात कहाँ से पैदा हो गई? अगर सड़कों पर गंदी-गंदी गालियों का भौंडा प्रदर्शन ही नारी सशक्तीकरण और आज़ादी की परिभाषा है, तो ऐसी आज़ादी पर 100 बार धिक्कार होना चाहिए। सबसे बड़ी हैरानी और घिनौनी बात तो यह है कि इन बेलगाम बेटियों के करतूतों के चित्र और वीडियो पूरी दुनिया देख चुकी है, मगर उनके जन्मदाताओं और माँ-बाप के मुँह में आज तक दही जमा हुआ है। उनकी यह रहस्यमयी चुप्पी बताती है कि या तो वे खुद इस पतन को मूक सहमति दे चुके हैं या फिर अपनी औलाद के आगे पूरी तरह लाचार हो चुके हैं। यह महज़ एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक ताने-बाने की आहुति है, जिस पर आज हर संवेदनशील नागरिक परेशान और स्तब्ध है।

--- लोकेश कुशवाहा 

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