तथाकथित छात्र प्रदर्शन CJP


 

तथाकथित छात्र आंदोलन का मामला दिखाता है कि कैसे छात्रों के वास्तविक और गंभीर मुद्दों की आड़ में सुनियोजित तरीके से एक अलग और भड़काऊ राजनीतिक एजेंडा चलाने की कोशिश की जाती है। जब नीट पेपर लीक जैसी संवेदनशील घटना के खिलाफ छात्रों का गुस्सा सड़कों पर फूटा, तो शुरुआती मांग बेहद स्पष्ट थी—तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और धांधली की निष्पक्ष जांच। हालांकि, विरोध प्रदर्शन शुरू होते ही कुछ ही मिनटों में इसका पूरा स्वरूप बदल दिया गया और मुख्य मुद्दे को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया। छात्रों के हक की लड़ाई कहे जाने वाले इस मंच से अचानक "उमर खालिद जिंदाबाद", "ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद" जैसे विभाजनकारी नारे गूंजने लगे। हद तो तब हो गई जब पूजनीय संतों पर अनर्गल टिप्पणियां करते हुए "प्रेमानंद महाराज को महाराज मत बोलो" कहा गया और देश के प्रधानमंत्री तक को "गोली मार दो" जैसे संगीन व हिंसक बयान दिए गए। धार्मिक और वैचारिक विभाजन को हवा देते हुए नारे लगाए गए कि "जय श्री राम नहीं, जय संविधान बोलेंगे" और फिर यह दावा ठोंका गया कि "बस नाम रहेगा अल्लाह का।"

यह महज इत्तेफाक नहीं था कि एक शैक्षणिक व्यवस्था की नाकामी पर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अचानक नफरती और उग्र बयानों का अड्डा बन गया। विरोध स्थल पर पुलिस प्रशासन पर खुलेआम पत्थरबाजी की गई, जिसने शांतिपूर्ण आंदोलन के खोखले दावों की पोल खोलकर रख दी। यही नहीं, इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक रसूख और अवसरवादिता भी साफ दिखाई दी, जहां आरोप लगे कि आम आदमी पार्टी के उपद्रवी और गुंडे भी भीड़ में शामिल होकर माहौल को बिगाड़ने में जुट गए थे। ऐसे में यह कड़वा सच सामने आता है कि लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़े नीट पेपर लीक के असली मुद्दे को बलि का बकरा बना दिया गया। सवाल यह उठता है कि क्या छात्रों के जायज गुस्से का इस्तेमाल राजनीतिक रोटियां सेंकने, धार्मिक वैमनस्य फैलाने और अपने-अपने छिपे हुए एजेंडों को साधने के लिए किया गया? जब एक छात्र आंदोलन में देशविरोधी और हिंसक मानसिकता वाले तत्व हावी हो जाएं, तो यह तय करना मुश्किल नहीं रह जाता कि असलियत क्या है। अब यह निर्णय जनता को करना है कि प्रदर्शन का वास्तविक मकसद पेपर लीक पर जवाबदेही तय करना था, या फिर इसकी आड़ में किसी और गहरी साजिश को अंजाम देना।

--- लोकेश कुशवाहा 

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