कारगिल विजय दिवस Kargil Vijay diwas
इतिहास को समझने और सहेजने का असली जरिया इतिहास की किताबों, प्राथमिक दस्तावेजों और वास्तविक संदर्भों में छिपा है, न कि फिल्मी पर्दे के केवल मनोरंजन के लिए गढ़े गए दृश्यों में। सिनेमा कई बार केवल व्यावसायिक लाभ के लिए बनाया जाता है, जबकि इतिहास का यथार्थ उन बलिदानों और संघर्षों से बनता है जिन्हें हमारे वीरों ने अपने रक्त से लिखा है। जब बात भारत माता की रक्षा और उसके अमर सपूतों की आती है, तो उनका वास्तविक त्याग किसी भी सिनेमाई ड्रामे से कहीं अधिक गरिमामय, प्रेरणादायक और रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। 1999 के कारगिल युद्ध का ऐसा ही एक अविस्मरणीय पृष्ठ कैप्टन विक्रम बत्रा और उनके साथियों का है, जिनका पराक्रम और समर्पण आज भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की लौ जलाता है।
जून 1999 के उस तपते युद्धकाल में जब कारगिल की द्रास घाटी की दुर्गम पहाड़ियों पर पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जा जमा लिया था, यहाँ से पाकिस्तानी सेना सीधे राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 1D) पर नजर रख सकती थी और भारतीय सेना की रसद आपूर्ति को बाधित कर रही थी। मई 1999 से ही दुश्मन ने इस बर्फीली चोटी पर मजबूत बंकर बना लिए थे। इस असंभव से दिखने वाले मिशन की कमान 18 ग्रेनेडियर्स को सौंपी गई, जिसका नेतृत्व कर्नल कुशल ठाकुर कर रहे थे।
तब 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के युवा कैप्टन विक्रम बत्रा को समुद्र तल से करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित 'पॉ
इंट 5140' को दुश्मन के चंगुल से छुड़ाने का जिम्मा सौंपा गया। अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन और सीधी चढ़ाई जैसी विकट परिस्थितियों के बावजूद, कैप्टन बत्रा ने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व पूरी निडरता से किया। दुश्मन ऊंची चोटियों से गोलियों और बमों की बौछार कर रहा था, इसी दौरान 'हाई डेप्थ' घातक प्लाटून का नेतृत्व कर रहे ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने गोलियों से छलनी होने के बावजूद तीन दुश्मन बंकरों को अकेले तबाह किया। 11 घंटे से अधिक समय तक चले आमने-सामने के भीषण मल्ल युद्ध के बाद, 4 जुलाई 1999 की सुबह 18 ग्रेनेडियर्स के जवानों ने टाइगर हिल की मुख्य चोटी पर तिरंगा फहराया। इसी ऐतिहासिक जीत के बाद विक्रम बत्रा ने रेडियो पर अपना वह अमर विजय संदेश दिया "ये दिल मांगे मोर!" इस एक वाक्य ने न केवल भारतीय सेना में जोश भर दिया, बल्कि पूरे देश को अटूट विश्वास से भर दिया।
'पॉइंट 5140' की विजय के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा का काम अभी पूरा नहीं हुआ था; उन्हें अगला कठिन लक्ष्य 'पॉइंट 4875' को मुक्त कराने का मिला। लगातार युद्ध की शारीरिक थकान और अस्वस्थ होने के बावजूद, उन्होंने मोर्चे पर जाने का निर्णय लिया।
7 जुलाई 1999 की तड़के जब भीषण लड़ाई जारी थी, तब कैप्टन बत्रा के साथी अधिकारी लेफ्टिनेंट नवीन अनुज नैय्यर गंभीर रूप से घायल हो गए। कैप्टन बत्रा उन्हें बचाने के लिए सीधी गोलीबारी के बीच कूद पड़े। जब एक अन्य साथी सैनिक ने उन्हें रोकना चाहा, तो उन्होंने उसे पीछे धकेलते हुए कहा कि तू हट जा, तेरे बाल-बच्चे हैं।
उसी दौरान दुश्मन के स्नाइपर की गोली कैप्टन विक्रम बत्रा के सीने में लगी और एक आरपीजी धमाके के बीच 'जय माता दी' कहते हुए यह अमर नायक भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गया। कैप्टन बत्रा के इस सर्वोच्च बलिदान, कैप्टन अनुज नैयर की शहादत, राइफलमैन संजय कुमार और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव के अकल्पनीय पराक्रम ने पूरी सेना में ऐसा उबाल पैदा कर दिया कि भारतीय सैनिकों ने दुश्मन का नामोनिशान मिटाकर पॉइंट 4875 पर तिरंगा लहरा दिया। भारतीय सेना ने कैप्टन विक्रम बत्रा के इस अभूतपूर्व शौर्य को अमर बनाने के लिए पॉइंट 4875 का नाम आधिकारिक रूप से 'बत्रा टॉप' रख दिया।
मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा को उनके अभूतपूर्व अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के उच्चतम सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से विभूषित किया गया। 'शेरशाह' के नाम से विख्यात इस वीर सपूत की गाथा हमें यह सिखाती है कि इतिहास केवल पन्नों में दर्ज तथ्य नहीं, बल्कि उन शहीदों की धड़कनें हैं जो देश की अखंडता के लिए मुस्कुराते हुए मौत के आगोश में समा गए। उनके इस बलिदान को दुनिया आज भी नमन करती है, और उनका जीवन आने वाली हर पीढ़ी के लिए राष्ट्र सेवा का सर्वोच्च प्रतीक बना रहेगा। इन तमाम परमवीरों, महावीर चक्र विजेताओं और वीरों की यह गाथा प्रमाणित करती है कि भारत का वास्तविक इतिहास किसी पर्दे की पटकथा से नहीं, बल्कि इन जांबाज सपूतों के अटूट संकल्प और लहू से लिखा जाता है।
--- लोकेश कुशवाहा
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