Reservation Hatao Andolan (RHA)
राष्ट्र की उन्नति का सीधा और अटूट नियम केवल एक है प्रतिभा की कद्र और मेहनत का सम्मान। लेकिन जब कोई देश योग्यता के बजाय पर्ची, काबिलियत के बजाय जन्म और बुद्धिमत्ता के बजाय जाति के प्रमाण पत्र पर अपनी व्यवस्था की नींव रखने लगे, तो विकास का पहिया आगे बढ़ने के बजाय गड्ढे में धंसने लगता है। किसी भी महाशक्ति बनने की होड़ में शामिल राष्ट्र के लिए यह पहली शर्त होनी चाहिए कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं, प्रशासनिक पदों और नीति-निर्माण की बागडोर देश के सबसे उत्कृष्ट दिमागों के हाथों में हो। अफसोस और विडंबना यह है कि जहां पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान और वैश्विक शोध में नए झंडे गाड़ रही है, वहां हमारे यहां मेधा का मापदंड प्रतिभा से नहीं, बल्कि जातिगत समीकरणों से तय हो रहा है। देश की नींव मजबूत रहेगी तो समाज और उसकी पहचान भी बची रहेगी, लेकिन यदि वोटबैंक और तुष्टीकरण के फेर में राष्ट्र का ढांचा ही खोखला हो गया, तो किसी भी जाति का वजूद नहीं बचने वाला।
मेहनत, लगन और काबिलियत को हाशिए पर धकेल कर कोई भी देश दुनिया का नेतृत्व करने का ख्वाब नहीं देख सकता। जब एक मेधावी युवा अपनी रात-दिन की तपस्या के बावजूद महज अपनी जाति की वजह से अवसर से वंचित रह जाता है, तो यह केवल उस युवा के साथ छलावा नहीं है, बल्कि देश के सुनहरे भविष्य की बलि चढ़ाना है। इसका सीधा और तीखा नतीजा 'ब्रेन ड्रेन' यानी प्रतिभा पलायन के रूप में सामने आता है, जहां देश की सबसे बेहतरीन मेधा विदेशों का रुख करती है और पराए देशों की जीडीपी व तकनीक को मजबूत करती है। कागजी फाइलों में विकास दर के बड़े-बड़े दावे करना बेहद आसान है, पर कड़वी सच्चाई यही है कि राष्ट्र की वास्तविक प्रगति जातियों के जोड़-तोड़ से नहीं, बल्कि नवाचार, उत्पादकता और कठिन परिश्रम से तय होती है।
हम जब अस्पताल में इलाज कराने जाते हैं, हवाई जहाज में सफर करते हैं या रक्षा तंत्र पर भरोसा करते हैं, तब तो हमें सबसे कुशल और योग्य हाथों की ही दरकार होती है; लेकिन इन्हीं पदों के चयन की नीति बनाते समय हम योग्यता के मानकों को ही किनारे रख देते हैं। जाति को हर इंसान अपने निजी जीवन, रीति-रिवाजों और सामाजिक परंपराओं में चाहे जितने गौरव के साथ सजाकर रखे, लेकिन जब इसे शिक्षा, शासन और लोकतंत्र के सबसे बड़े हथियार यानी वोट में घसीट लिया जाता है, तो पूरी व्यवस्था को दीमक चाट जाती है।
लोकतंत्र में जनता को अब यह सीधा गणित समझ ही लेना चाहिए कि जाति का दायरा केवल घर-परिवार तक सीमित होना चाहिए जैसे कि दामाद चुनते वक्त उसकी पड़ताल कर ली जाए। लेकिन जब बात देश के लिए नेता, जनप्रतिनिधि या नीति-निर्माता चुनने की आए, तो वहां जाति का चश्मा उतारकर सिर्फ योग्यता देखनी चाहिए, क्योंकि आपको देश चलाने के लिए सक्षम जनसेवक चुनना है, कोई रिश्तेदार या दामाद नहीं। आरक्षण का विचार यदि वंचितों को सक्षम और समर्थ बनाने तक सीमित रहे तो यह स्वागत योग्य है, पर जब यह योग्यता को ही खारिज करने का साधन बन जाए, तो देश का पिछड़ना तय है। जब तक राष्ट्रहित को सबसे ऊपर रखकर 'मेरिट' यानी योग्यता को उसका सच्चा स्थान नहीं मिलेगा, तब तक विकास की बातें केवल एक सुंदर छलावा ही रहेंगी।
--- लोकेश कुशवाहा
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