दादरा और नगर हवेली की मुक्ति का इतिहास
दादरा और नगर हवेली की मुक्ति का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक बेहद रोमांचक और गौरवशाली अध्याय है। भारत को 1947 में ब्रिटिश शासन से तो आजादी मिल गई थी, लेकिन दादरा और नगर हवेली का यह क्षेत्र तब भी पुर्तगाली औपनिवेशिक नियंत्रण में था। स्थानीय जनता इस दमनकारी विदेशी शासन से पूरी तरह मुक्त होना चाहती थी। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए साल 1954 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आजाद गोमांतक दल, यूनाइटेड फ्रंट ऑफ गोअंस और नेशनल कांग्रेस जैसे संगठनों के राष्ट्रवादी स्वयंसेवकों ने मिलकर एक गुप्त योजना बनाई। इस मुक्ति अभियान की शुरुआत 22 जुलाई 1954 की रात को हुई, जब फ्रांसिस मस्कारेन्हास और वामन देसाई के नेतृत्व में स्वयंसेवकों ने दादरा के पुर्तगाली पुलिस स्टेशन पर अचानक हमला कर दिया और वहां तैनात सुरक्षा बलों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया।
दादरा पर सफल नियंत्रण पाने के बाद देशभक्त स्वयंसेवकों ने नगर हवेली की तरफ रुख किया। पुर्तगाली सेना ने सिलवासा और नरोली जैसे इलाकों में भारतीयों को रोकने की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रवादियों के अटूट साहस और स्थानीय जनता के भारी समर्थन के आगे वे टिक नहीं सके। अंततः 2 अगस्त 1954 को पुर्तगाली सेना के कमांडर कैप्टन फिदालगो ने अपनी सेना के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। इसी ऐतिहासिक दिन सिलवासा के मुख्यालय पर पुर्तगाली ध्वज को हमेशा के लिए हटाकर गर्व से भारत का तिरंगा झंडा फहराया गया और इस पूरे क्षेत्र को पुर्तगाली दासता से पूरी तरह स्वतंत्र घोषित कर दिया गया।
स्वतंत्रता मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक कारणों से इस क्षेत्र को तुरंत आधिकारिक तौर पर भारत का हिस्सा नहीं बनाया जा सका। इस वजह से वहां की जनता ने एक स्वतंत्र प्रशासन चलाने का फैसला किया और 'वरिष्ठ पंचायत' का गठन किया। इस दौरान प्रशासनिक कार्यों को संभालने के लिए के. जी. बदलानी को इस मुक्त क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया गया। लगभग सात साल तक यह क्षेत्र एक स्वतंत्र इकाई के रूप में काम करता रहा। इसके बाद भारत सरकार ने 11 अगस्त 1961 को संसद में दसवां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया, जिसके तहत दादरा और नगर हवेली को औपचारिक रूप से भारत संघ में शामिल कर एक केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया।
--- लोकेश कुशवाहा
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