किशोर कुमार ने संजय गांधी के फरमाइश पर जब गाना नहीं गया


 

4 अगस्त 1929 को मशहूर गायक और कलाकार किशोर कुमार का जन्म हुआ था, उनका जन्म खंडवा, मध्यप्रदेश में हुआ था।

4 अगस्त 1929 को जन्मे देश के चहेते और अज़ीम गायक किशोर कुमार के जन्मदिन के इस अवसर पर कांग्रेस और संजय गांधी के उसी काले कारनामे और तानाशाही का एक खौफनाक किस्सा उजागर होता है। जो आज मैं आपको बताता हूं। 1976 के उस दौर को याद कीजिए जब भारत में आपातकाल का काला साया छाया हुआ था। संविधान को ताक पर रखकर देश को एक तानाशाही सोच के हवाले कर दिया गया था। उसी समय कांग्रेस पार्टी और युवा कांग्रेस के मुख्य मार्गदर्शक बने संजय गांधी के अहंकार की कोई सीमा नहीं थी। सत्ता के मद में चूर सरकार ने अपनी नीतियों और काम का ढोल पीटने के लिए दिल्ली में 'गीतों भरी शाम' नाम से एक बड़े संगीतमय कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की। इस सरकारी तमाशे में बॉलीवुड के तमाम मशहूर कलाकारों और गायकों को हुक्म बजाने और हाजिरी लगाने का कड़ा फरमान जारी किया गया था।

इसी सिलसिले में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव सी.बी. जैन ने किशोर कुमार से संपर्क साधा और उन्हें इस शो में अपनी आवाज देने के लिए दिल्ली आने का फरमान सुनाया। लेकिन खुद्दार और अपनी शर्तों पर जीने वाले किशोर कुमार ने कांग्रेस सरकार की इस सनक को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने बिना किसी डर के साफ शब्दों में कह दिया कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है और वे अपनी मर्जी के खिलाफ किसी भी राजनीतिक या सरकारी मंच पर कतई नहीं गाएंगे। किशोर कुमार का यह निडर और कड़ा रुख संजय गांधी की तानाशाही के मुंह पर एक जोरदार तमाचा था। उनके आदेश की इस नाफरमानी से पूरी कांग्रेस सरकार तिलमिला उठी और बदले की आग में जलने लगी।

संजय गांधी के इशारे पर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने तुरंत एक आपात बैठक बुलाई और एक निडर कलाकार को सबक सिखाने की घिनौनी साजिश रची। सत्ता के अहंकार में अंधी हो चुकी सरकार ने तुरंत प्रभाव से ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के सभी गानों के प्रसारण पर पूरी तरह बैन लगा दिया। तानाशाही का क्रूर चेहरा यहीं खत्म नहीं हुआ; ग्रामोफोन कंपनियों को सख्त आदेश जारी किए गए कि वे किशोर कुमार के गानों के नए रिकॉर्ड न बनाएं और पुराने रिकॉर्ड्स की बिक्री भी तुरंत रोक दें। हद तो तब हो गई जब सेंसर बोर्ड के जरिए उनकी आने वाली फिल्मों के गानों को भी दबाने और रोकने की पूरी कोशिश की गई।

मई 1976 से लागू हुआ यह काला प्रतिबंध महीनों तक सरकारी मीडिया पर हावी रहा और देश के सबसे लोकप्रिय गायक की आवाज को सरकारी तंत्र के जरिए दबाकर रखा गया। हालांकि बाद में कुछ फिल्मी हस्तियों के बीच-बचाव और खुद किशोर कुमार द्वारा दिए गए एक लिखित स्पष्टीकरण के बाद सरकार के तेवर थोड़े ढीले जरूर पड़े, लेकिन उनके गानों पर लगा यह तानाशाही प्रतिबंध पूरी तरह तभी हट सका जब 1977 में आपातकाल का खात्मा हुआ और जनता पार्टी की सरकार आई। भारतीय सिनेमा और संगीत के इतिहास में यह घटना कांग्रेस की निरंकुश सत्ता के नंगे नाच, व्यक्तिगत अहंकार और एक आजाद कलाकार की स्वतंत्रता पर किए गए सबसे कायरतापूर्ण हमले की गवाह है। अगर किसी कलाकार की इच्छा नहीं है तो उस पर अपनी सनक नहीं थोपी जा सकती, लेकिन आपातकाल के उस काले दौर में कांग्रेस ने यही तानाशाही पूरा देश झेलने पर मजबूर किया था।

--- लोकेश कुशवाहा 

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