श्यामलाल गुप्त “पार्षद”
श्यामलाल गुप्त “पार्षद” का जन्म 16 सितंबर 1893 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के नर्वल कस्बे में एक वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर प्रसाद और माता का नाम कौशल्या देवी था। बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत पार्षद जी ने अपने पारिवारिक व्यवसाय को अपनाने से मना कर दिया और अध्यापन को अपना पेशा चुना। उन्होंने कानपुर के विभिन्न विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। इसके साथ ही वे देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से कूद पड़े। उन्होंने 'सचिव' नामक एक मासिक पत्र का संपादन और प्रकाशन किया, जिसके माध्यम से वे लोगों में आजादी की अलख जगाते थे। उन्होंने वर्ष 1924 में अपने सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा’ की रचना की थी। इस प्रेरक गीत ने स्वतंत्रता सेनानियों में अभूतपूर्व जोश भरने का काम किया। उनकी इस महान कृति की महत्ता को देखते हुए वर्ष 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में इसे देश के आधिकारिक 'झंडा गीत' के रूप में स्वीकार किया गया था।
पार्षद जी जीवनभर सादगी और राष्ट्रसेवा के सिद्धांतों पर चले। स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने किसी राजनीतिक पद की लालसा नहीं की और समाज सेवा में लगे रहे। देश के प्रति उनके इसी निस्वार्थ समर्पण, स्वतंत्रता आंदोलन में दिए गए योगदान और अमूल्य साहित्य सेवा के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1969 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा था। 10 अगस्त 1977 को 83 वर्ष की आयु में इस महान राष्ट्रभक्त और कवि का निधन हो गया। उनके सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने वर्ष 1997 में एक विशेष स्मारक डाक टिकट भी जारी किया था।
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