FCRA संशोधन विधेयक को JPC के पास भेजा


 

भारतीय संसद में किसी भी दूरगामी कानून को पारित कराने की प्रक्रिया केवल बहुमत साबित करने का खेल नहीं होती, बल्कि यह दूरदर्शी नीतिगत रणनीति और प्रशासनिक दूरदर्शिता का हिस्सा होती है। FCRA (विदेश अंशदान विनियमन अधिनियम) संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने के फैसले को सरकार का "पीछे हटना" या बैकफुट पर आना कहना राजनीतिक रूप से अदूरदर्शी और प्रक्रियात्मक रूप से गलत है। यह कदम सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक रणनीतिक एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत वह ऐसे दूरगामी असर वाले कानूनों को अदालती चुनौतियों और कानूनी खामियों से मुक्त बनाना चाहती है।

अगर अतीत के उदाहरणों पर नज़र डालें तो मोदी सरकार का रिकॉर्ड यह साफ दर्शाता है कि किसी विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने से उसके मूल स्वरूप या मंशा पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार ने पूर्व में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), वक्फ संशोधन विधेयक, दिवालियापन संहिता (IBC) और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम (DPDP) जैसे संवेदनशील और जटिल विधेयकों को गहन समीक्षा के लिए संसदीय समितियों के पास भेजा था। क्या इसका मतलब यह था कि सरकार ने अपने एजेंडे से समझौता कर लिया था? बिल्कुल नहीं। इन तमाम कानूनों पर संसदीय समितियों में लंबी बहस हुई, विभिन्न हितधारकों के विचार सुने गए और अंततः ये विधेयक और अधिक मजबूत, स्पष्ट तथा कानूनी रूप से टिकाऊ होकर बाहर आए।

FCRA केवल एक साधारण विधायी संशोधन नहीं है, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और गैर-सरकारी संगठन (NGO) इकोसिस्टम के सीधे नियमन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला है। विदेशी फंडिंग के जरिए देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने के प्रयासों को रोकना किसी भी मजबूत सरकार की प्राथमिकता होती है। इतने महत्वपूर्ण कानून को बिना व्यापक विचार-विमर्श के जल्दबाजी में पास कराना भविष्य में न्यायिक बाधाओं या लागू करने में प्रशासनिक कमियों का कारण बन सकता है। ऐसे में JPC के जरिए इसकी गहन समीक्षा कराना इस कानून के सुरक्षा मानकों को और भी कड़ा और अचूक बनाने की एक सुनियोजित तैयारी है।

इसमें एक और महत्वपूर्ण आयाम यह है कि संसदीय समिति में जाने से विपक्षी दलों के सुझावों को शामिल करने और उनकी आपत्तियों का रिकॉर्ड पर जवाब देने का मौका मिलता है। इससे कानून की राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ती है और भविष्य में इसे लागू करते समय उठने वाले अनावश्यक विवादों पर विराम लगता है। JPC में जाने का सीधा अर्थ है कि कानून में मौजूद हर संभावित कानूनी छिद्र (loophole) को बंद किया जाए, ताकि जब यह अंतिम रूप से लागू हो तो इसे अदालत में आसानी से चुनौती न दी जा सके।

संक्षेप में कहें तो JPC के पास किसी विधेयक का जाना सुधारों की वापसी नहीं, बल्कि उन्हें प्रशासनिक और कानूनी रूप से बुलेटप्रूफ बनाने की एक स्थापित प्रक्रिया है। जिस प्रकार नागरिकता संशोधन अधिनियम और वक्फ सुधार जैसे विषयों पर सरकार ने अपने रुख पर कायम रहते हुए संस्थागत प्रक्रियाओं का सम्मान किया, उसी प्रकार FCRA में प्रस्तावित सुधार भी अपने तार्किक अंजाम तक पहुँचेंगे। राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के मामले पर सरकार के कड़े रुख को देखते हुए यह स्पष्ट है कि FCRA सुधार अपनी पूरी रणनीतिक मजबूती के साथ कानून का रूप लेंगे।

--- लोकेश कुशवाहा 

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