मोदी के reels वीडियो


 

राजनीतिक मंच हो या डिजिटल दुनिया, जब-जब यह माना जाता है कि खेल के नियम तय हो चुके हैं, तब-तब कोई आकर पूरी बाजी ही पलट देता है। जो लोग कल तक प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को सिर्फ एक कुशल नेतृत्वकर्ता, कठोर शासक और रणनीतिकार मानकर अपनी फाइलें तैयार कर रहे थे, आज वे अपने चश्मे का नंबर बदलने पर मजबूर हैं। अब समझ आ रहा है कि देश के प्रधानसेवक सिर्फ सत्ता के गलियारों में ही हुकूमत नहीं चलाते, बल्कि जब डिजिटल मंच पर उतरते हैं, तो बड़े से बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर, ट्रॉलर और रोस्टर भी अपनी स्क्रिप्ट भूल जाते हैं। मात्र कुछ ही दिनों के अपने इस नए डिजिटल अवतार से उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के कंटेंट क्रिएटर्स की नींद उड़ा दी है। जिस काम को करने के लिए आजकल की पूरी युवा पीढ़ी दिन-रात हैशटैग, ट्रेंड और बैकग्राउंड म्यूज़िक के फेर में पड़ी रहती है, उसे हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने चुटकी बजाते ही मिनटों में एक नया कीर्तिमान बना दिया।

मात्र एक हफ्ते के भीतर इंस्टाग्राम पर पचास लाख नए फॉलोअर्स जोड़ लेना और एक अरब यानी पूरे एक हजार मिलियन रील व्यूज का पहाड़ खड़ा कर देना कोई मामूली बात नहीं है। यह रिकॉर्ड देखकर बड़े-बड़े डिजिटल सूरमाओं के पसीने छूट गए हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक रिकॉर्ड के बाद जिस चीज़ की खपत सबसे तेज़ गति से बढ़ी है, वह है सुकून देने वाली मलहम। देश के कुछ स्वघोषित बौद्धिक नेता, असफल अभिनेता, और विदेशों में बैठकर भारत पर ज्ञान पेलने वाले कुछ दिहाड़ी यूट्यूबर आजकल भारी डिजिटल जलन से पीड़ित नजर आ रहे हैं। इस खास बिरादरी में एक प्रसिद्ध जर्मन शेफर्ड, अपने कद से दो फुट ऊंची बातें करने वाला कीड़ा, और पुराने ज़माने के टिकट ब्लैकिए मुख्य रूप से शामिल हैं, जिनकी पूरी दुकान ही मोदी विरोध के नाम पर चलती है।

इन तमाम डिजिटल प्राणी-समूहों की सबसे बड़ी खासियत ही यही है कि ये प्रधानमंत्री जी का रत्ती भर भी कुछ बिगाड़ नहीं सकते, लेकिन विरोध का ड्रामा ऐसे रचाते हैं मानो देश की पूरी विदेश नीति इन्हीं के एक ट्वीट पर टिकी हो। आज जब जनता मोदी जी की रील्स पर तालियां बजा रही है, तब ये लोग रील्स के एंगल, बैकग्राउंड स्कोर और फ्रेमिंग का मजाक उड़ाकर खुद को समझदारी का नोबेल पुरस्कार देने में जुटे हैं। हालांकि, ये जितने भी तमगे खुद की छाती पर लटका लें, देश की जनता ने इन्हें बहुत पहले ही अपने मनोरंजन के डिब्बे में बंद कर दिया है।

वैसे मोदी जी की एक बात माननी पड़ेगी, वे समय-समय पर अपने विरोधियों को ऐसे-ऐसे काम में उलझा देते हैं कि पूरे देश को मुफ़्त के मनोरंजन की कभी कमी ही नहीं खलती। हालांकि, जनता को असल डिजिटल ज्ञान से ज्यादा अपने मनोरंजन के असली सरताज यानी हमारे प्रिय पप्पू जी के बयानों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है। पर क्या करें, जब तक मुख्य कलाकार अपनी नई पटकथा के साथ मंच पर नहीं लौटते, तब तक इन छोटे-मोटे दिहाड़ी क्रिएटर्स के रोने-धोने से ही देश की जनता अपना दिल बहला रही है।

--- लोकेश कुशवाहा 

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