1 सितंबर 1798 को हैदराबाद के निजाम अली खान और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई सहायक संधि भारतीय इतिहास का एक बड़ा मोड़ थी, जिसने भारत की स्वतंत्रता को गहरे जख्म दिए
1 सितंबर 1798 को हैदराबाद के निजाम अली खान और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई सहायक संधि भारतीय इतिहास का एक बड़ा मोड़ थी, जिसने भारत की स्वतंत्रता को गहरे जख्म दिए। गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेज़ली की इस कूटनीतिक चाल को स्वीकार करने वाली हैदराबाद पहली रियासत बनी। मराठों और टीपू सुल्तान के डर से निजाम ने अपने राज्य में ब्रिटिश सेना रखना स्वीकार तो कर लिया, लेकिन बदले में अपनी संप्रभुता पूरी तरह खो दी। इस संधि के कारण निजाम को अपने दरबार से फ्रांसीसियों को निकालना पड़ा और अपनी विदेश नीति अंग्रेजों के हाथों में सौंपनी पड़ी। इस व्यवस्था ने हैदराबाद को अंदर से खोखला कर दिया क्योंकि सेना का भारी-भरकम खर्च उठाने के लिए जनता पर करों का बोझ लाद दिया गया, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गई और शासक केवल अंग्रेजों की कठपुतली बनकर रह गए।
पूरे भारत के संदर्भ में इस संधि के बेहद विनाशकारी और गलत परिणाम सामने आए। इसने एक-एक कर भारतीय रियासतों की स्वतंत्रता को पूरी तरह लील लिया। इस नीति के कारण भारतीय शासक अपनी ही सेना से हाथ धो बैठे और पूरी तरह ब्रिटिश सुरक्षा पर निर्भर हो गए, जिसने उन्हें मानसिक रूप से गुलाम बना दिया। ब्रिटिश सेना का खर्च उठाने के चक्कर में देसी राज्यों में भयंकर आर्थिक संकट पैदा हुआ, जिससे किसानों और आम जनता का बेरहमी से शोषण हुआ। सबसे बुरा असर यह हुआ कि शासक अब अपनी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रहे क्योंकि उन्हें पता था कि विद्रोह होने पर ब्रिटिश सेना उनकी रक्षा करेगी, जिससे राज्यों में कुशासन और अराजकता फैल गई। अंततः इस संधि ने बिना कोई युद्ध लड़े अंग्रेजों को पूरे भारत का सर्वोच्च राजनीतिक और सैन्य स्वामी बना दिया और भारतीय राजाओं को अपने ही महलों में कैदी जैसी स्थिति में ला खड़ा किया।
-- लोकेश कुशवाहा
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