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भारत सरकार अधिनियम' Government of India Act 1858

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  2 अगस्त 1858 का वर्ष आधुनिक भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मोड़ था। साल 1857 में हुई देशव्यापी महान क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार को यह अहसास हो गया कि भारत जैसे विशाल देश का शासन अब ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी एक व्यापारिक कंपनी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसी वजह से ब्रिटिश संसद ने 2 अगस्त 1858 को 'भारत सरकार अधिनियम' (Government of India Act 1858) पारित किया। इस कानून के लागू होते ही भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन पूरी तरह समाप्त हो गया। भारत की सत्ता का पूरा नियंत्रण सीधे ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया यानी ब्रिटिश क्राउन के हाथों में सौंप दिया गया। इस ऐतिहासिक बदलाव के कारण भारत की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को बदल दिया गया। भारत के सर्वोच्च प्रशासनिक पद 'गवर्नर-जनरल' का नाम बदलकर 'वायसराय' कर दिया गया, जिसका सीधा मतलब था कि अब वह व्यक्ति भारत में ब्रिटिश क्राउन का सीधा प्रतिनिधि होगा। लॉर्ड कैनिंग को भारत का पहला वायसराय बनाया गया। इसके साथ ही, ब्रिटेन की संसद में भारत के मामलों को संभालने के लिए एक नए पद 'भारत सचिव' (Secretary of State ...

दादरा और नगर हवेली की मुक्ति का इतिहास

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  दादरा और नगर हवेली की मुक्ति का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक बेहद रोमांचक और गौरवशाली अध्याय है। भारत को 1947 में ब्रिटिश शासन से तो आजादी मिल गई थी, लेकिन दादरा और नगर हवेली का यह क्षेत्र तब भी पुर्तगाली औपनिवेशिक नियंत्रण में था। स्थानीय जनता इस दमनकारी विदेशी शासन से पूरी तरह मुक्त होना चाहती थी। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए साल 1954 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आजाद गोमांतक दल, यूनाइटेड फ्रंट ऑफ गोअंस और नेशनल कांग्रेस जैसे संगठनों के राष्ट्रवादी स्वयंसेवकों ने मिलकर एक गुप्त योजना बनाई। इस मुक्ति अभियान की शुरुआत 22 जुलाई 1954 की रात को हुई, जब फ्रांसिस मस्कारेन्हास और वामन देसाई के नेतृत्व में स्वयंसेवकों ने दादरा के पुर्तगाली पुलिस स्टेशन पर अचानक हमला कर दिया और वहां तैनात सुरक्षा बलों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया। दादरा पर सफल नियंत्रण पाने के बाद देशभक्त स्वयंसेवकों ने नगर हवेली की तरफ रुख किया। पुर्तगाली सेना ने सिलवासा और नरोली जैसे इलाकों में भारतीयों को रोकने की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रवादियों के अटूट साहस और स्थानीय जनता के भारी समर्थन के आगे वे ...

उधम सिंह को फांसी

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  शहीद उधम सिंह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक अत्यंत साहसी और समर्पित क्रांतिकारी थे, जिन्होंने देश के सम्मान के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। उनका जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। उनके जीवन की सबसे निर्णायक और दर्दनाक घटना 13 अप्रैल 1919 को घटी, जब अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश जनरल डायर के आदेश पर हजारों निहत्थे और मासूम भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं। उधम सिंह उस समय वहां मौजूद थे और वे खुद इस भयानक नरसंहार के चश्मदीद गवाह बने। इस क्रूर घटना ने उनके किशोर मन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने उसी समय जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर इस नरसंहार के मुख्य दोषियों से बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी। अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए उधम सिंह ने कई देशों की यात्रा की, विभिन्न नाम बदले और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर काम किया। गदर पार्टी से जुड़ने के कारण उन्हें भारत में पांच साल की जेल की सजा भी काटनी पड़ी। मित्रों रोजाना पोस्ट के लिए मुझे फॉलो कीजिए नहीं तो मैं खो जाऊंगा। 🙏 जेल से रिहा होने के बाद वे किसी तरह पंजाब से ...

भारत के जेन जी की करतूत

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  ओटीटी के पर्दे से गटर की तरह बही भाषा का कचरा आख़िरकार जंतर-मंतर के रास्तों से होकर देश के दीवानखानों तक पहुँच ही गया। सोशल मीडिया पर तैरती उन तस्वीरों और वीडियो ने नई पीढ़ी की तथाकथित 'क्रांतिकारी' युवतियों के चरित्र, संयम और संस्कारों की जो धज्जियाँ उड़ाई हैं, उसने पूरे समाज के माथे पर कलंक का टिका लगा दिया है। जब सड़कों पर खड़े होकर जुबान से आज़ादी के नाम पर नंगनाच किया जाएगा, तो कल को यही विकृति घरों के भीतर पहाड़ों से धकेलने, संदूकों में लाशें सड़ाने और नीले ड्रमों में रिश्तों को बंद करके नदियों में बहाने का दुस्साहस बनेगी। शबाना आजमी, अरुंधती रॉय और स्वरा भास्कर जैसे ठेकेदारों को आज अपनी इस 'प्रोग्रेसिव फसल' को लहलहाते देखकर यकीनन गहरा सुकून मिल रहा होगा, जिनका पूरा जीवन ही इस देश की पारिवारिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने और कुंवारे-अनब्याहे वंश की पौध तैयार करने में बीत गया। जिस भारत की पहचान वीरांगनाओं के त्याग, शौर्य और गरिमा से थी, वहाँ ये बदजुबान, उच्छृंखल और जुबानी जुगली करने वाली जमात कहाँ से पैदा हो गई? अगर सड़कों पर गंदी-गंदी गालियों का भौंडा प्रदर्शन ही नारी सश...

चीन के हेबेई प्रांत के औद्योगिक शहर तांगशान में एक विनाशकारी भूकंप

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  28 जुलाई 1976 को सुबह 3:42 बजे चीन के हेबेई प्रांत के औद्योगिक शहर तांगशान में एक विनाशकारी भूकंप आया था। रिक्टर पैमाने पर 7.8 की तीव्रता वाले इस भीषण भूकंप ने पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया था। इस प्राकृतिक आपदा में शहर की 85 प्रतिशत से अधिक इमारतें पूरी तरह ढह गईं। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस तबाही में लगभग 2,42,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और करीब 1,60,000 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह आधुनिक इतिहास के सबसे घातक भूकंपों में से एक माना जाता है। #चीन #भूकंप #earthquake #China #chinese #Fact #History #factsdaily

भारत में पहली बार उँगलियों के निशान का उपयोग किया

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  28 जुलाई 1858 को भारतीय सिविल सेवा के ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम जेम्स हर्शेल ने भारत में पहली बार उँगलियों के निशान का उपयोग किया था। बंगाल के जंगीपुर में तैनात हर्शेल ने एक स्थानीय व्यापारी राजधर कोनाई के साथ सड़क निर्माण सामग्री की आपूर्ति का एक आधिकारिक अनुबंध किया था। इस समझौते पर हस्ताक्षर को धोखाधड़ी से बचाने और भविष्य में मुकरने से रोकने के लिए उन्होंने व्यापारी के दाहिने हाथ की हथेली और उँगलियों की छाप कागज़ पर ली थी। यह कदम प्रशासनिक और कानूनी कार्यों में पहचान सुनिश्चित करने के लिए फिंगरप्रिंट तकनीक के इस्तेमाल की शुरुआत बना, जो बाद में चलकर आधुनिक फोरेंसिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा साबित हुआ। #भारत #इतिहास #Bharat #History #Fact #factsdaily #facts #IndianHistory #Fingerprint

पहला विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914

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  प्रथम विश्व युद्ध मानव इतिहास का एक अत्यंत विनाशकारी और युगांतरकारी वैश्विक संघर्ष था, जिसकी शुरुआत आधिकारिक तौर पर 28 जुलाई 1914 को हुई थी। इस महायुद्ध का तात्कालिक कारण 28 जून 1914 को बोस्निया की राजधानी साराजेवो में ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की एक सर्बियाई राष्ट्रवादी द्वारा की गई हत्या थी। इस घटना से आक्रोशित होकर ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया को एक कठोर अल्टीमेटम दिया और उसकी मांगें पूरी न होने पर ठीक एक महीने बाद सर्बिया के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया। इस घोषणा ने यूरोप में बारूद के ढेर की तरह काम किया और देखते ही देखते पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। युद्ध की शुरुआत होते ही यूरोप में पहले से बनी गुप्त संधियों के जाल ने एक श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू कर दी। सर्बिया की रक्षा के लिए रूस आगे आया, जिसके जवाब में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी का साथ देते हुए रूस और फ्रांस के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। जब जर्मन सेना ने बेल्जियम के रास्ते फ्रांस पर हमला किया, तो बेल्जियम की तटस्थता की रक्षा के लिए ब्रिटेन भी इस जंग में कूद ...

Reservation Hatao Andolan (RHA)

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  राष्ट्र की उन्नति का सीधा और अटूट नियम केवल एक है प्रतिभा की कद्र और मेहनत का सम्मान। लेकिन जब कोई देश योग्यता के बजाय पर्ची, काबिलियत के बजाय जन्म और बुद्धिमत्ता के बजाय जाति के प्रमाण पत्र पर अपनी व्यवस्था की नींव रखने लगे, तो विकास का पहिया आगे बढ़ने के बजाय गड्ढे में धंसने लगता है। किसी भी महाशक्ति बनने की होड़ में शामिल राष्ट्र के लिए यह पहली शर्त होनी चाहिए कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं, प्रशासनिक पदों और नीति-निर्माण की बागडोर देश के सबसे उत्कृष्ट दिमागों के हाथों में हो। अफसोस और विडंबना यह है कि जहां पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान और वैश्विक शोध में नए झंडे गाड़ रही है, वहां हमारे यहां मेधा का मापदंड प्रतिभा से नहीं, बल्कि जातिगत समीकरणों से तय हो रहा है। देश की नींव मजबूत रहेगी तो समाज और उसकी पहचान भी बची रहेगी, लेकिन यदि वोटबैंक और तुष्टीकरण के फेर में राष्ट्र का ढांचा ही खोखला हो गया, तो किसी भी जाति का वजूद नहीं बचने वाला। मेहनत, लगन और काबिलियत को हाशिए पर धकेल कर कोई भी देश दुनिया का नेतृत्व करने का ख्वाब नहीं देख सकता। जब एक मेधावी युवा अपनी...

कारगिल विजय दिवस भारत में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को मनाया जाता है

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  कारगिल विजय दिवस भारत में प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को मनाया जाता है, जो सन 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की ऐतिहासिक जीत और वीर जवानों के सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है। वर्ष 2026 में देश इस शौर्य गाथा की 27वीं वर्षगांठ मना रहा है। #कारगिल #कारगिल_विजय_दिवस #KargilVijayDiwas #Bharat #Hindu #भारत #हिन्दू #IndianArmy

Kargil Vijay Diwas कारगिल विजय दिवस

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  कारगिल युद्ध 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर के कारगिल जिले में लड़ा गया एक भीषण सशस्त्र संघर्ष था। इस युद्ध की शुरुआत मई 1999 में हुई, जब पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करके कारगिल, द्रास, बटालिक और तुर्तुक सेक्टर की रणनीतिक चोटियों पर गुप्त रूप से कब्जा कर लिया था। पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य श्रीनगर और लेह को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 1डी को काटना था, ताकि सियाचिन ग्लेशियर और लद्दाख का संपर्क बाकी भारत से पूरी तरह टूट जाए। मई के शुरुआती हफ्ते में जब स्थानीय चरवाहों ने इन घुसपैठियों को देखा, तब भारतीय सेना को इस बड़े पैमाने की घुसपैठ का पता चला। इसके तुरंत बाद भारतीय सेना ने दुश्मन को खदेड़ने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसे आधिकारिक तौर पर 'ऑपरेशन विजय' नाम दिया गया था। यह युद्ध सैन्य इतिहास के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण युद्धों में से एक माना जाता है, क्योंकि यह 16,000 से 18,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर लड़ा गया था। भारतीय सैनिकों को न केवल दुश्मन का सामना करना था, बल्कि माइनस 15 डिग्री तक गिरने वाले तापमान, ऑक्सीजन की भारी ...

टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थकों के लिए

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  राष्ट्र के गौरव और उसकी संप्रभुता से बढ़कर इस धरा पर कुछ नहीं होता, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, तुच्छ स्वार्थों और राजनीतिक लाभ के लिए उन लोगों के पीछे खड़ा होने लगता है जो देश को बाँटने का स्वप्न देखते हैं, तो उसकी आत्मा की मृतप्राय स्थिति पर तरस नहीं, बल्कि क्रोध आता है। आजाद कश्मीर और "भारत तेरे टुकड़े होंगे" जैसे विषैले, राष्ट्रघाती और घिनौने नारे जब इस देश की हवाओं में गूँजते हैं, और उन्हें सुनकर भी यदि किसी का रक्त खौलने की बजाय शांत पड़ा रहता है, यदि किसी का हृदय तिलमिलाता नहीं, तो समझ लीजिए कि उस देह में संवेदना नहीं बल्कि नपुंसकता दौड़ रही है। ऐसे मोड़ पर हर उस व्यक्ति को अपनी रगों में बहते खून की शुद्धता की जाँच अवश्य करवा लेनी चाहिए। एक बार नहीं, सौ बार अपने कथित राष्ट्रप्रेम पर धिक्कार भेजना चाहिए और हजार बार अपने अस्तित्व की बुनियाद पर, अपनी माँ के चरित्र पर यह कठोर प्रश्न दागना चाहिए कि उस कुपुत्र के जन्म के समय क्या वह स्वयं सरहद पार पाकिस्तान गई थी, या फिर वहाँ से कोई कबीलाई उसकी अस्मत से खेलने आया था? क्योंकि जो अपनी मातृभूमि के बँट...

कारगिल विजय दिवस Kargil Vijay diwas

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  इतिहास को समझने और सहेजने का असली जरिया इतिहास की किताबों, प्राथमिक दस्तावेजों और वास्तविक संदर्भों में छिपा है, न कि फिल्मी पर्दे के केवल मनोरंजन के लिए गढ़े गए दृश्यों में। सिनेमा कई बार केवल व्यावसायिक लाभ के लिए बनाया जाता है, जबकि इतिहास का यथार्थ उन बलिदानों और संघर्षों से बनता है जिन्हें हमारे वीरों ने अपने रक्त से लिखा है। जब बात भारत माता की रक्षा और उसके अमर सपूतों की आती है, तो उनका वास्तविक त्याग किसी भी सिनेमाई ड्रामे से कहीं अधिक गरिमामय, प्रेरणादायक और रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। 1999 के कारगिल युद्ध का ऐसा ही एक अविस्मरणीय पृष्ठ कैप्टन विक्रम बत्रा और उनके साथियों का है, जिनका पराक्रम और समर्पण आज भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की लौ जलाता है। जून 1999 के उस तपते युद्धकाल में जब कारगिल की द्रास घाटी की दुर्गम पहाड़ियों पर पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जा जमा लिया था, यहाँ से पाकिस्तानी सेना सीधे राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 1D) पर नजर रख सकती थी और भारतीय सेना की रसद आपूर्ति को बाधित कर रही थी। मई 1999 से ही दुश्मन ने इस बर्फीली चोटी पर मजबूत बंकर बना लिए थे। इस अ...

व्यूअरशिप से नया वर्ल्ड रिकॉर्ड

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  नरेंद्र मोदी जी ने पिछले 24 घंटों में अपनी रील की व्यूअरशिप से नया वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया है। पूरी दुनिया में आज तक किसी भी रील को एक दिन में इतने व्यूज नहीं मिले थे, पूरे 303 मिलियन! यानी 30 करोड़ से भी ज़्यादा व्यूज। इससे पहले यह रिकॉर्ड एक अमेरिकी यूट्यूबर के नाम था। यह रिकॉर्ड पहले एक अमेरिकी यूट्यूबर, फीफा वर्ल्ड कप 2026 और बीटीएस (BTS) की एक इंस्टाग्राम रील के नाम था, जिसे 24 घंटे में 300 मिलियन (30 करोड़) व्यूज मिले थे। पूरी दुनिया के इस रिकॉर्ड को तोड़ते हुए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 303 मिलियन व्यूज के साथ एक नया वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम कर दिया है। पिछले 24 घंटों में उनके 1 मिलियन फॉलोअर्स भी बढ़ गए हैं। अभी कुछ मिनट पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने एक और रील शेयर कर इसके लिए धन्यवाद दिया है। Gen-Z, छात्रों और युवाओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी का जैसा जुड़ाव है, वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन जो लोग युवाओं और छात्रों के कंधे का इस्तेमाल करके अपना करियर लॉन्च करने की फिराक में थे, उनकी उम्मीदें अब जरूर क्रैश हो सकती हैं, आप समझ ही रहे होंगे कि मैं किसकी बात कर रहा हूँ! #M...

पीएम मोदी ने अपना पूरा जीवन देश को समर्पित किया है

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  नीट परीक्षा और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर जंतर-मंतर पर आयोजित छात्र आंदोलन में शामिल होकर आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निजी और अभद्र हमला बोलते हुए मंच से कहा "मोदी जी के अपने बच्चे नहीं हैं, इसलिए उन्हें नहीं पता कि बच्चे क्या होते हैं और वे बच्चों का दर्द नहीं समझते।" यह बयान पूरी तरह से उनकी राजनीतिक हताशा, नीतिगत शून्यता और घटिया मानसिकता का परिचायक है। जब कोई नेता प्रशासनिक विफलताओं पर तर्कसंगत बहस करने में नाकाम हो जाता है, तो वह इसी तरह के व्यक्तिगत और अमर्यादित बयानों का सहारा लेकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करता है। अगर केजरीवाल के इस कुतर्क को सच मान भी लिया जाए कि बच्चे न होने के कारण मोदी जी को फर्क नहीं पड़ता, तो फिर सवाल सीधा केजरीवाल और बाकी विपक्षी कुनबे से है। केजरीवाल साहब, आपके तो बच्चे हैं, फिर वे इस छात्र आंदोलन में सड़कों पर धक्के खाते क्यों नहीं दिख रहे? वे जंतर-मंतर पर आकर प्रदर्शन का हिस्सा कब बनेंगे? प्रियंका गांधी वाड्रा के बच्चे इस आंदोलन में सड़कों पर क्यों नहीं उतरते? अखिलेश यादव के बच्...

हुगली नदी पर भारत की पहली संगठित नौका दौड़ प्रतियोगिता

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  25 जुलाई 1813 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में हुगली नदी पर भारत की पहली संगठित नौका दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। इस ऐतिहासिक प्रतियोगिता की शुरुआत ब्रिटिश अधिकारियों और स्थानीय व्यापारियों के सहयोग से हुई थी। उस समय हुगली नदी व्यापार और परिवहन का मुख्य केंद्र थी, इसलिए इस दौड़ को देखने के लिए नदी के किनारों पर हजारों लोगों की भारी भीड़ जमा हुई थी। इस आयोजन में विभिन्न प्रकार की पारंपरिक और आधुनिक नावों ने हिस्सा लिया था, जिसने भारत में जल क्रीड़ा (Water Sports) और आधुनिक खेल आयोजनों की नींव रखी। यह आयोजन इतना सफल रहा कि इसके बाद कोलकाता और भारत के अन्य हिस्सों में भी नियमित रूप से ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाने लगा। India's First Boat Race  #WaterSports #BoatRace #Boat #Race #NaukaDaud #Nauka #नौका #नौकादौड़ #कलकत्ता #हुगली #Hugli

तथाकथित छात्र प्रदर्शन CJP

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  तथाकथित छात्र आंदोलन का मामला दिखाता है कि कैसे छात्रों के वास्तविक और गंभीर मुद्दों की आड़ में सुनियोजित तरीके से एक अलग और भड़काऊ राजनीतिक एजेंडा चलाने की कोशिश की जाती है। जब नीट पेपर लीक जैसी संवेदनशील घटना के खिलाफ छात्रों का गुस्सा सड़कों पर फूटा, तो शुरुआती मांग बेहद स्पष्ट थी—तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और धांधली की निष्पक्ष जांच। हालांकि, विरोध प्रदर्शन शुरू होते ही कुछ ही मिनटों में इसका पूरा स्वरूप बदल दिया गया और मुख्य मुद्दे को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया। छात्रों के हक की लड़ाई कहे जाने वाले इस मंच से अचानक "उमर खालिद जिंदाबाद", "ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद" जैसे विभाजनकारी नारे गूंजने लगे। हद तो तब हो गई जब पूजनीय संतों पर अनर्गल टिप्पणियां करते हुए "प्रेमानंद महाराज को महाराज मत बोलो" कहा गया और देश के प्रधानमंत्री तक को "गोली मार दो" जैसे संगीन व हिंसक बयान दिए गए। धार्मिक और वैचारिक विभाजन को हवा देते हुए नारे लगाए गए कि "जय श्री राम नहीं, जय संविधान बोलेंगे" और फिर यह दावा ठोंका गया कि "बस ना...

ऑल इंडिया रेडियो All india Radio

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  भारत में नियमित रेडियो प्रसारण की शुरुआत 23 जुलाई 1927 को बॉम्बे (अब मुंबई) से हुई थी। इस ऐतिहासिक दिन पर देश का पहला निजी रेडियो स्टेशन 'इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी' के तहत शुरू किया गया था। इसके ठीक एक महीने बाद, 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता में भी एक रेडियो स्टेशन की शुरुआत की गई। भारतीय इतिहास में इस महत्वपूर्ण बदलाव की याद में हर साल 23 जुलाई को पूरे देश में 'राष्ट्रीय प्रसारण दिवस' के रूप में मनाया जाता है। शुरुआती दौर में यह सेवा निजी हाथों में थी, लेकिन वित्तीय संकट के कारण साल 1930 में ब्रिटिश सरकार ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया और इसका नाम बदलकर 'भारतीय राज्य प्रसारण सेवा' कर दिया। इसके बाद 8 जून 1936 को इस सेवा का नाम बदलकर 'ऑल इंडिया रेडियो' कर दिया गया, जो आज भी दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है। आजादी के बाद साल 1957 में ऑल इंडिया रेडियो को आधिकारिक तौर पर 'आकाशवाणी' नाम दिया गया, जिसका अर्थ है 'आसमान से आने वाली आवाज'। रेडियो ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम, सूचनाओं के प्रसार, शिक्षा और मनोरंजन में एक...

बाल गंगाधर तिलक जयंती Bal Gangadhar Tilak Jayanti

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  साल 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक जी का जन्म हुआ। उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पहले लोकप्रिय नेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने जनता के मन में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ चेतना जगाई। उन्होंने देशवासियों को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बनाने के लिए "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" का ऐतिहासिक नारा दिया, जो पूरे देश में क्रांति का मंत्र बन गया। ब्रिटिश अधिकारी उन्हें भारतीय अशांति का जनक कहते थे, क्योंकि उन्होंने आम जनता को ब्रिटिश राज के खिलाफ खड़ा होने का साहस दिया था। तिलक जी ने समाज को एकजुट करने और सांस्कृतिक चेतना जगाने के लिए गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे सार्वजनिक त्योहारों की शुरुआत की। उन्होंने लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए केसरी और मराठा जैसे समाचार पत्रों का संपादन किया, जिसके कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने देशवासियों में राष्ट्रवाद की भावना फूंकने के लिए स्वदेशी आंदोलन को एक मुख्य हथियार बनाया, जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार...

चंद्रशेखर आजाद जयंती (Chandra Shekhar Azad Jayanti)

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  भारत के अमर जनेऊधारी क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा में हुआ था, जिसे आज उनके सम्मान में चंद्रशेखर आज़ादनगर कहा जाता है। वे बचपन से ही बेहद साहसी थे, उनका पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था और मात्र 15 वर्ष की आयु में मोहनदास करमचंद गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए थे। इसी दौरान जब उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, तो उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने अपना नाम 'आज़ाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और घर का पता 'जेलखाना' बताया था। इस पर उन्हें 15 कोड़े मारने की सजा मिली, लेकिन हर कोड़े पर उन्होंने 'भारत माता की जय' का नारा लगाया और तभी से उनका नाम हमेशा के लिए आज़ाद पड़ गया। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी संगठनों में से एक 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) के प्रमुख और कमांडर-इन-चीफ थे। शुरुआत में वे रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व वाले संगठन से जुड़े और 1925 के ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन में सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में बिस्मिल जी की शहादत के बाद उन्...

मुलायम सिंह ने सत्ता में आते ही 1994 में नकल-विरोधी कानून को निरस्त करके नकल माफियाओं का भला किया।

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  1991 में जब उत्तर प्रदेश में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी, तब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री और राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री थे। उस दौर में यूपी बोर्ड की परीक्षाओं की साख पूरी तरह रसातल में जा चुकी थी। परीक्षा केंद्रों पर संगठित 'नकल माफिया' का कब्जा था और खुलेआम 'सामूहिक नकल' का व्यापार चलता था। उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को इस दीमक से बचाने के लिए तत्कनीन यूपी के शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक कड़ा कदम उठाने का फैसला किया। इसी मंशा के साथ 1992 में एंटी-कॉपी कानून यानी 'उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम' लागू किया गया। इस कानून की सबसे सख्त और विवादास्पद विशेषता यह थी कि इसमें नकल करने और करवाने दोनों को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित कर दिया गया। पुलिस को अधिकार मिला कि वह सीधे परीक्षा केंद्रों में दाखिल होकर तलाशी ले सकती है। नतीजा यह हुआ कि परीक्षा कक्षों में पर्ची या बोलकर नकल कराने वालों के साथ-साथ रंगे हाथों पकड़े गए छात्रों को भी हथकड़ी लगाकर सीधे जेल भेजा जाने लगा। कानून लागू होते ही नकल माफिय...